Uncategorized

उदासी – कहानी- सुनीता तिवारी”सरस”

 

आज मन बहुत उदास था। काफी पुराना रिश्ता जो बदल गया था, उसकी टीस भीतर कहीं गहराई तक चुभ रही थी। ऐसा नहीं था कि बात अचानक खत्म हो गई हो
बस धीरे-धीरे सब कुछ बदलता चला गया, और मैं समझ ही नहीं पाई कि कब वो अपनापन औपचारिकता में बदल गया।

कभी घंटों चलने वाली बातें अब दो-चार शब्दों में सिमट गई थीं। पहले हर छोटी खुशी और दुख साझा होते थे, अब जैसे सब कुछ छिपाकर रखने की आदत हो गई थी। मैं अक्सर पुराने संदेश पढ़ती, तस्वीरों को देखती और सोचती, क्या सच में वही रिश्ता है, या बस उसकी यादें ही बाकी हैं?

एक समय था जब बिना कहे भी सब समझ लिया जाता था। अब कहने पर भी समझ नहीं आता। शायद समय के साथ लोग बदलते हैं, उनकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। लेकिन क्या इतना बदल जाना ज़रूरी होता है कि पहचान ही धुंधली पड़ जाए?

उस दिन हिम्मत करके मैंने बात करने की ठानी। फोन उठाया, कई बार नंबर डायल किया, फिर काट दिया। मन में डर था अगर जवाब वैसा ही ठंडा हुआ तो? पर फिर सोचा, जो पहले ही बदल चुका है, उससे और क्या डरना।

आख़िरकार कॉल किया। उधर से वही आवाज़ थी, मगर उसमें वो गर्माहट नहीं थी जो कभी सुकून देती थी। औपचारिक बातें हुईं, हालचाल पूछा गया, और कुछ ही मिनटों में बातचीत खत्म भी हो गई। फोन रखते ही एक अजीब सी खालीपन ने घेर लिया।

पर उसी खालीपन में एक सच्चाई भी साफ़ दिखी कुछ रिश्ते समय के साथ बदल जाते हैं, और उन्हें जबरदस्ती पहले जैसा बनाने की कोशिश सिर्फ खुद को दुख देती है। शायद कुछ रिश्तों का खूबसूरत होना ही उनकी यादों तक सीमित रह जाना है।

मैंने आँसू पोंछे और मन को समझाया, हर रिश्ता हमेशा एक जैसा नहीं रहता, लेकिन जो समय साथ बिताया, वो झूठा नहीं था। वो आज भी उतना ही सच्चा है।

धीरे-धीरे उदासी थोड़ी हल्की होने लगी। मैंने तय किया कि अब उस बदले हुए रिश्ते से नहीं, बल्कि खुद से जुड़ने की कोशिश करूंगी। क्योंकि कभी-कभी सबसे जरूरी रिश्ता वही होता है, जो हम खुद से निभाते हैं।

सुनीता तिवारी”सरस”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!