राम के आदर्शों से ही नई पीढ़ी सीखेगी भाईचारे और मर्यादा का पाठ , गुरुकुल परंपरा और भारतीय संस्कृति को शिक्षा से जोड़ने की जरूरत – संत श्री विष्णु दास नागा जी
जयपुर। बदलते सामाजिक परिवेश और आधुनिकता की दौड़ के बीच भारतीय संस्कृति, पारिवारिक संस्कार और गुरु-शिष्य परंपरा के कमजोर होते जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए संत विष्णु दास नागा ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता के आकर्षण में अपनी मूल संस्कृति और संस्कारों से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। इसका सीधा प्रभाव परिवार, समाज और आपसी रिश्तों पर पड़ रहा है।
संत विष्णु दास नागा ने पत्रकार जे. पी. शर्मा के साथ विशेष वार्ता में कहा कि भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, संस्कार, परिवार व्यवस्था, गुरु परंपरा, गौसेवा और आध्यात्मिक जीवन से है। जब कोई समाज अपनी जड़ों से कटने लगता है तो उसके सामने अनेक सामाजिक समस्याएं जन्म लेने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि आज माता-पिता की बात सुनने और उनके अनुभव से सीखने की परंपरा कमजोर होती जा रही है। गुरु के वचनों का पालन करने की भावना भी कम होती दिखाई दे रही है। भाई-भाई के बीच प्रेम और त्याग की जगह स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा ने ले ली है। रिश्तों में छोटी-छोटी बातों को लेकर दरार पैदा हो रही है। परिवार में बुजुर्गों का सम्मान कम होना भी चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि यदि आज की पीढ़ी को यह समझाया जाए कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के प्रति किस प्रकार प्रेम, त्याग और सम्मान का भाव रखते थे, तो भाई-भाई के रिश्ते की वास्तविक मर्यादा समझी जा सकती है। श्रीराम का जीवन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि पारिवारिक एवं सामाजिक आदर्शों का भी उदाहरण है।
गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता
संत विष्णु दास नागा ने कहा कि प्राचीन भारत की गुरुकुल व्यवस्था केवल अक्षर ज्ञान देने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि उसमें शिक्षा के साथ संस्कार, अनुशासन, सेवा, संयम और राष्ट्रभावना का निर्माण किया जाता था। आज गुरुकुल परंपरा सीमित होकर रह गई है। आवश्यकता है कि आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कारों को भी उचित स्थान दिया जाए।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को चरित्रवान, संस्कारी, जिम्मेदार और समाज के प्रति संवेदनशील नागरिक बनाए।
इतिहास और महापुरुषों से नई पीढ़ी को जोड़ना जरूरी
संत ने कहा कि भारत का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह सहित अनेक महापुरुषों ने त्याग, शौर्य, धर्म और राष्ट्रहित के लिए अपना जीवन समर्पित किया। नई पीढ़ी को उनके जीवन और संघर्षों से परिचित कराना आवश्यक है।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यदि बच्चों को अपनी सभ्यता, संस्कृति और महापुरुषों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलेगी तो वे अपनी पहचान और गौरव को कैसे समझ पाएंगे। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में भारतीय संस्कृति, नैतिक शिक्षा और देश के महान व्यक्तित्वों के जीवन-चरित्र को उचित स्थान देने की आवश्यकता बताई।
गौसेवा से दूर होना भी चिंता का विषय
संत विष्णु दास नागा ने कहा कि सनातन परंपरा में गौ को केवल एक पशु के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे सेवा, करुणा और भारतीय जीवन-पद्धति से जोड़ा गया है। आज की पीढ़ी गौसेवा और जीव दया की परंपरा से दूर होती जा रही है। उन्होंने कहा कि बच्चों में बचपन से ही जीवों के प्रति दया, सेवा और करुणा का भाव विकसित किया जाना चाहिए।
राजनीति में विभाजन की प्रवृत्ति पर भी जताई चिंता
संत विष्णु दास नागा ने कहा कि समाज को बांटने वाली राजनीति किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि सरकारों और राजनीतिक दलों को ऐसी नीतियों से बचना चाहिए जिनसे समाज में आपसी दूरी या विभाजन बढ़े। लोकतंत्र का उद्देश्य जनता को जोड़ना और उनकी समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज जितना मजबूत और संगठित होगा, राष्ट्र उतना ही मजबूत होगा। इसलिए जाति, क्षेत्र, भाषा और अन्य आधारों पर आपसी वैमनस्य बढ़ाने के बजाय सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
संस्कार बचेंगे तो परिवार और समाज बचेग
संत विष्णु दास नागा ने कहा कि आधुनिकता का विरोध करना समाधान नहीं है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति और संस्कारों को भूल जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। उन्होंने अभिभावकों से आह्वान किया कि वे बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही न दें, बल्कि उन्हें अपने परिवार, संस्कृति, महापुरुषों, धर्मग्रंथों और भारतीय परंपराओं से भी परिचित कराएं।
उन्होंने कहा कि बच्चों को राम के त्याग से भाईचारा, माता-पिता से सम्मान, गुरु से अनुशासन, गौसेवा से करुणा और महापुरुषों के जीवन से राष्ट्रभक्ति सीखनी चाहिए। संत ने कहा कि यदि परिवार संस्कारों का केंद्र बने, विद्यालय शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण का माध्यम बने और समाज अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए जागरूक हो, तो आने वाली पीढ़ी आधुनिक भी होगी और अपनी जड़ों से जुड़ी हुई भी।
उन्होंने अंत में कहा कि आज आवश्यकता किसी संस्कृति को मिटाने की नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति को समझने और उसके श्रेष्ठ मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की है। संस्कारों की जड़ें मजबूत होंगी तो परिवार मजबूत होंगे, परिवार मजबूत होंगे तो समाज मजबूत होगा और मजबूत समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण करेगा।




