आँखों में बचा हुआ समय -डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ लेखिका एवं कवयित्री

बुजुर्गों की आँखों में झाँकना दरअसल समय में झाँकना है।
वहाँ कुछ धुँधली तस्वीरें होती हैं, कुछ आवाज़ें, कुछ चेहरे, कुछ अधूरी इच्छाएँ और कुछ ऐसी प्रतीक्षाएँ, जिनकी कोई अंतिम तारीख नहीं होती।
चेहरे पर पड़ी झुर्रियाँ केवल उम्र की निशानियाँ नहीं हैं। वे उन रास्तों का नक्शा हैं, जिन पर चलते हुए एक पूरा जीवन बीता है।
हम अक्सर बुजुर्गों को उनके वर्तमान से पहचानते हैं—धीमी चाल, काँपते हाथ, कमजोर होती दृष्टि और बार-बार दोहराई जाने वाली बातें। लेकिन शायद हम भूल जाते हैं कि इस धीमे वर्तमान के भीतर कभी एक तेज़ दौड़ता हुआ जीवन था।
एक ऐसा जीवन, जिसमें संघर्ष था।
जिसमें सपने थे।
और सबसे बढ़कर—अपने लोगों के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का साहस था।
संघर्ष—जिसे उन्होंने कभी कहानी नहीं बनाया
आज हम अपने छोटे-छोटे अभावों को भी बहुत बड़ा मान लेते हैं। लेकिन हमारे बुजुर्गों ने अभावों को जीवन का हिस्सा मानकर जीना सीखा था।
किसी पिता ने सीमित आय में बच्चों के भविष्य के लिए सपने सँजोए। किसी माँ ने अपनी इच्छाओं को परिवार की जरूरतों के पीछे रख दिया। किसी ने धूप में काम किया, किसी ने बरसों तक एक ही चीज़ को सँभालकर रखा, ताकि बच्चों को किसी चीज़ की कमी न महसूस हो।
उन्होंने संघर्ष किया, लेकिन संघर्ष का प्रदर्शन नहीं किया।
शायद इसलिए उनके हाथों की कठोरता हमें दिखाई नहीं देती।
हम केवल उनकी हथेलियों को देखते हैं, उन पर लिखी हुई मेहनत को नहीं।
उनके चेहरे पर मुस्कान होती है, लेकिन उस मुस्कान तक पहुँचने के लिए उन्होंने कितने आँसू भीतर रोके होंगे—यह कोई नहीं जानता।
प्रतीक्षा—जो उम्र के साथ लंबी होती जाती है
बुढ़ापे में प्रतीक्षा का अर्थ बदल जाता है।
युवा उम्र में हम किसी अवसर की प्रतीक्षा करते हैं, किसी सफलता की, किसी नए कल की।
बुजुर्ग अक्सर किसी अपने की प्रतीक्षा करते हैं।
फोन की घंटी बजेगी—शायद बेटा होगा।
दरवाजे पर दस्तक होगी—शायद बेटी आई होगी।
कोई कहेगा—“आज आपके पास बैठने आया हूँ।”
और कभी-कभी कोई नहीं आता।
तब भी वे दरवाजे की ओर देखते रहते हैं।
शायद इसलिए नहीं कि उन्हें यकीन होता है कि कोई आएगा, बल्कि इसलिए कि प्रतीक्षा करना भी उनके जीवन का एक हिस्सा बन चुका होता है।
बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठा कोई बुजुर्ग बाहर से गुजरती हर आहट को पहचानने की कोशिश करता है।
कितनी अजीब बात है—
जिस घर को उन्होंने कभी लोगों से भरा था, उसी घर में एक समय ऐसा आता है जब वे किसी एक आवाज़ के लिए तरसने लगते हैं।
त्याग—जिसका हिसाब कभी नहीं रखा गया
बुजुर्गों की सबसे बड़ी पूँजी शायद उनकी स्मृतियाँ नहीं, उनके त्याग हैं।
उन्होंने अपने बच्चों को वह दिया, जो उनके पास था—और कई बार वह भी दिया, जो उनके पास नहीं था।
उन्होंने अपने सपने स्थगित किए ताकि बच्चों के सपने पूरे हो सकें।
उन्होंने अपनी इच्छाओं को यह कहकर समझाया—
“अभी बच्चों की जरूरत है।”
और यही “अभी” कभी-कभी पूरी जिंदगी बन गया।
लेकिन उन्होंने हिसाब नहीं रखा।
न कोई सूची बनाई, न कोई दावा किया।
क्योंकि सच्चा त्याग कभी रसीद नहीं माँगता।
शायद इसी कारण बुजुर्ग जब अपने बच्चों को सुखी देखते हैं, तो उनके चेहरे पर ऐसी संतुष्टि उतर आती है, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।
हमें क्या बचाना है?
आज हम पुरानी वस्तुओं को संग्रहालयों में सुरक्षित रखते हैं।
पुराने सिक्के, पत्र, तस्वीरें, दस्तावेज़—सब सँभालकर रखते हैं।
लेकिन घर में बैठे उस बुजुर्ग की स्मृतियों को कौन सँभालेगा, जिसने उन सिक्कों का समय देखा है?
उस माँ की कहानी कौन लिखेगा जिसने उन तस्वीरों में दर्ज लोगों को अपनी आँखों के सामने जीवन दिया था?
उस पिता की स्मृतियों को कौन सुनेगा, जिसने परिवार के लिए अपना पूरा जीवन खपा दिया?
हमारे बुजुर्ग चलते-फिरते इतिहास हैं।
उनके पास किताबों में दर्ज न हुआ समाज है।
उनके पास रिश्तों की वह भाषा है, जिसे हमारी व्यस्त जिंदगी धीरे-धीरे भूल रही है।
इसलिए उन्हें केवल देखभाल की जरूरत नहीं।
उन्हें सुने जाने की जरूरत है।
उनकी बातें भले हमें कई बार सुनी हुई लगें, फिर भी उन्हें सुनना चाहिए।
क्योंकि उनके लिए वह कहानी पुरानी नहीं होती।
वह उनके जीवन का वह हिस्सा होती है, जिसमें वे अब भी अपने प्रिय लोगों के साथ मौजूद हैं।
और अंततः…
एक दिन वह आवाज़ नहीं होगी।
बरामदे की वह कुर्सी खाली होगी।
कमरे में रखी चीज़ें अपनी जगह पर होंगी, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने वाला कोई नहीं होगा।
तब शायद हमें उनकी कही हुई कोई साधारण-सी बात अचानक याद आएगी।
कोई पुराना किस्सा।
कोई अधूरा वाक्य।
कोई पुकार।
और तब समझ आएगा कि हम जिसे उनकी “पुरानी बातें” समझकर टालते रहे, वह दरअसल हमारे परिवार की जीवित विरासत थी।
इसलिए जब तक वे हमारे बीच हैं—
उनकी आँखों में झाँकिए।
उनसे उनके बीते दिनों के बारे में पूछिए।
उनके किस्से सुनिए।
क्योंकि बुजुर्गों की आँखों में सिर्फ अतीत नहीं रहता—
वहाँ हमारा कल भी सुरक्षित रहता है।
और जब उनकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो जाएँगी,
तब शायद हमें पहली बार समझ आएगा—
हमने किसी बुजुर्ग को नहीं खोया,
हमने समय का एक पूरा अध्याय खो दिया।
डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश




