पर्वत खड़ा शीश को तान –बबीता शर्मा

शीश तान पर्वत खड़ा,रक्षा में तत्पर,
तनिक थकान का नहीं आभास , सजग रहे तत्पर।
आंधी तूफानों से लड़ता,कर्तव्य सदा निभाए ,
चाहे धड़ से शीश अलग हो,वचन सदा निभाए ।
नदियों की बहती जलधार,कहती साहस ,शौर्य गाथा,
छन छन स्वर फूटता,सम्मान में झुकता माथा ।
मुख पर कहानी जन जन के ,महाकाव्य निर्मित होता,
गान कर रहा कण कण धरा,गीत है गुंजित होता ।
महिमा मंडित शीश जड़ी ,अभिमान से शीश है उठता,
सदा चरणों में शीश नवाओ,शैलाब जिगर में उठता।
सुर असुर खड़े कतार में ,दृश्य अनुपम छटा निराली ,
करें मुस्कान नृत्य धरा पर , मन बन रहा मद की प्याली।
देवदार भी खड़े शीश तान ,करते स्वागत की तैयारी,
वल्लरी भी नहीं चूकती ,करती नृत्य की तैयारी।
लिया आगोश धरा को निज ,चुंबन माथे पर करती,
चढ़ती तरु के वक्षस्थल ,संदेशा अम्बर को है देती ।
मरु थार का उड़ता रेत , स्वयं दूत है बन जाता ,
लिए वीरता का संदेशा,मानो जग प्राणों में सांस भरता ।
बबीता शर्मा




