शीर्षक: शारदीय नवरात्र आगमन – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

अक्टूबर की ठंडी हवाओं और शरद पूर्णिमा की आहट के बीच, क्वार (आश्विन) के शारदीय नवरात्र शुरू होते ही घर का कोना-कोना जगमगा उठा। वर्षों बाद जब माँ शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर घर पहुँचीं, तो लगा मानो साक्षात माँ दुर्गा के रूप में गृहलक्ष्मी ने पदार्पण किया हो।
“माँ के आंचल की छाँव क्या मिली, सारा जग ही निहाल हो गया, जिसके सिर पर पड़ा माँ का हाथ, उसका जीवन ही खुशहाल हो गया।”
पूरे घर में कलश स्थापना की सुगंध, धूप-दीप की महक और माँ के हाथों की बनी पारंपरिक पूजन सामग्री ने सारे वातावरण को पवित्र कर दिया। माँ के आते ही अकेलेपन और सूनेपन की हर उदासी पलभर में छूमंतर हो गई। उनके स्नेहिल स्पर्श और ममतामयी आंचल की छाँव ने जीवन की हर थकान को मिटा दिया।
माँ के हाथों का बना गरम भोजन और उनका बार-बार यह पूछना कि “पेट भरकर खाया या नहीं?” बचपन की उन सुनहरी यादों को फिर से ताजा कर गया। इस व्यस्त भागदौड़ भरी जिंदगी में, माँ की यह दो पल की फिक्र और उनका साथ अनमोल था।
शारदीय नवरात्र के इन पवित्र दिनों में माँ का घर पर होना किसी बड़े वरदान से कम नहीं था। उनकी मौजूदगी से हर सूना कोना महक उठा और घर का हर सदस्य आत्मिक आनंद से भर गया। सचमुच, यह आगमन जीवन को खुशियों से रोशन कर गया।
सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




