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आपके पांव देखें…शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

 

मीना कुमारी की पाकीज़ा देखते देखते आंख लग गई और अगले दिन की ट्रेन पकड़ने का ख्वाब देखते हुए सो गए हम, राजकुमार के इंतज़ार में। हमारी सोच की गाड़ी सेकेंड एसी की बर्थ से सीधे दिल के प्लेटफॉर्म तक सरपट दौड़ पड़ी और हम तो टिकट भी नहीं कटवा पाए, बस लिफ्ट लेकर अपने ख्वाबों में सवार हो गए! थोड़ी मस्ती, थोड़ा प्यार, और हमारे पैर। हमारे पैर बहुत हसीन थे पर चिप्स के पैकेट और बिस्किट के चूरे ने सब बर्बाद कर दिया। प्यारी मीना कुमारी जैसे, पाकीज़गी से महकते हमारे नरम-नरम रगड़े हुए पैर और राजकुमार का इंतज़ार। सोचकर तो मेरा दिल हिचकियां लेने लगा! वो सफेद शरारा, वो बारिश, वो पीली बत्ती, और फिर राजकुमार की जगह कॉकरोच का बेबी! क्या आइटम ट्विस्ट था ये। वैसे आपको क्या लगता है, राजकुमार आया होगा या वो कहीं कोने में बैठा हमारे पैर देखकर बेहोश हो गया होगा। या फिर वह चाय वाला ही तो राजकुमार नहीं था जिसने पैर देखकर कागज़ पर इश़्क़ उकेरा हो फिर कुली की पुकार सुन गुमनाम हो गया। या फिर वो कागज़ सच में हमारे पैरों के लिए लिखा गया था, मैडम, पैर तो बहुत सुंदर हैं, लेकिन नेल पॉलिश बहुत चटकीली लगाई है आपने। रेल की रफ्तार में दिल टूटने की आहट, घुँघरुओं की छनक में कोई ख़ामोश मदभरी चाहत, और उस कागज़ की लकीरों में जुगनू सी एक मोहब्बत की झलक। लेकिन अफ़सोस, मुझ हीरोइन की सामने वाली बर्थ खाली रही और कागज़ का टुकड़ा सपना ही रह गया। राजकुमार गायब था और बचा क्या, कॉकरोच और खाली चिप्स का पैकेट!
किसी के इंतज़ार में हमारे हसीन पैर तरसते रहे और थक-हार कर जमीन पर उतर ही गये।

रुआंसे से हम सोचते हैं, कोई बात नहीं अब अगली यात्रा में क्या करना है, ये एक लिस्ट में नोट कर लेंगे ख्वाबों में उतरने से पहले।

शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

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