Uncategorized

रूठी रानी उमादे भटियानी : वचन, मान और मौन की अमर गाथा – नरसा राम जांगु

 

कुछ प्रेम बोलकर अमर नहीं होते, कुछ रूठकर इतिहास बन जाते हैं।
कुछ वचन निभाने के लिए नहीं, तोड़ने की सज़ा देने के लिए याद रखे जाते हैं।
यह कहानी है उस रानी की, जिसने पटरानी का पद पाकर भी पति से एक शब्द न कहा, और मौन को ही अपना श्रृंगार बना लिया।

—

1. सोने-सी जैसलमेर की बिटिया

16वीं सदी का समय था। जैसलमेर के रावल जैतसी भाटी की लाडली बेटी थी उमादे। चेहरे पर तेज, आंखों में स्वाभिमान और बातों में तलवार-सी धार। पूरे राजपूताने में उसके रूप और गुणों की चर्चा थी। जैसलमेर की रेत भी उसे ‘सोने की बिटिया’ कहकर पुकारती थी।

उधर मारवाड़ का सूरज थे राव मालदेव राठौड़। वीर, नीतिज्ञ और महत्वाकांक्षी। दिल्ली के बाद सबसे बड़ी सल्तनत के स्वामी। दो शक्तिशाली घरानों को जोड़ने के लिए राजनीति ने एक डोर बुनी — उमादे का विवाह राव मालदेव से तय हुआ।

संवत 1594, लगभग 1537 ई. में जैसलमेर में धूमधाम से विवाह हुआ। डोले में बैठकर उमादे जोधपुर आई — मेहरानगढ़ की पटरानी बनकर।

2. एक वचन, जो टूट गया

कहते हैं विवाह की रात राव मालदेव ने उमादे से वादा किया था — “आज पहली रात मैं केवल तुम्हारे कक्ष में आऊंगा, रानी। यह तुम्हारा अधिकार है।”

उमादे ने उस वचन को अपने हृदय में बांध लिया। सोलह श्रृंगार कर, पलकें बिछाए वह प्रतीक्षा करती रही।

पर राजा न आए।

राज-काज और पुराने संबंधों के मोह में बंधे राव मालदेव उस रात अपनी बड़ी रानी स्वरूपदे के महल चले गए। वे उमादे को दिया वचन भूल गए।

सुबह जब दासियों से उमादे को यह समाचार मिला, तो मानो बिजली गिरी। आंखों में आंसू नहीं, अंगारे थे। जिस स्वाभिमान से वह पली-बढ़ी थी, वह तार-तार हो गया।

उमादे ने उसी क्षण अपने कंगन उतारकर रख दिए और प्रण लिया:
“जिसने वचन तोड़कर मेरे मान को ठेस पहुंचाई, उससे मैं इस जन्म में एक शब्द न कहूंगी। मेरी जीभ पर आज से मृत्यु तक ताला रहेगा।”

3. मौन का महल, और पछतावे की उम्र

राव मालदेव को जब अपनी भूल का अहसास हुआ, तो वे दौड़े-दौड़े आए। क्षमा मांगी, मनुहार की, आंसू बहाए। उन्होंने कहा — “रानी, भूल हो गई। राजा हूं, पर मनुष्य भी हूं। एक अवसर दो।”

पर उमादे पत्थर हो चुकी थीं। उन्होंने आंख उठाकर भी न देखा। बस मौन।

उस दिन के बाद उमादे जीवन भर न बोलीं। मेहरानगढ़ में ‘रूठी रानी का महल’ आज भी उस मौन का साक्षी है। वे पटरानी के सारे कर्तव्य निभाती रहीं — त्योहार पर दान दिया, प्रजा की सुध ली, कुलदेवी की पूजा की। बस पति के सामने उनकी वाणी मौन रही।

राव मालदेव ने 25 साल राज किया। इतिहास कहता है कि वे उमादे के रूप पर रीझे हुए थे। अंतिम समय तक वे मनाते रहे, पर रानी का प्रण न टूटा। 1562 ई. में मालदेव का स्वर्गवास हुआ। कहते हैं चिता पर लेटने से पहले तक उनकी आंखें उमादे के कक्ष की ओर ही देखती रहीं।

4. रूठी रानी, पर हारी नहीं

मालदेव के बाद उमादे सती नहीं हुईं। उन्होंने जोगन का वेश धारण कर लिया और बाकी जीवन ईश्वर भजन और प्रजा सेवा में बिता दिया। यह उनका दूसरा प्रण था — “जिसने जीते जी मेरा मान न रखा, उसके पीछे मरकर मैं अपना मान क्यों गंवाऊं?”

उमादे ने बता दिया कि स्त्री का प्रेम समर्पण मांगता है, पर अपमान पर वह वज्र भी बन सकती है।

5. आज भी जीवित है वह मौन

आज जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग में ‘रूठी रानी का महल’ देखने लाखों लोग आते हैं। राजस्थान के गांव-गांव में ‘रूठी रानी’ के दूहा और गीत गाए जाते हैं।

उमादे भटियानी हार कर नहीं, जीतकर गईं। उन्होंने एक वचन की कीमत पर पूरा जीवन दांव पर लगा दिया और सिद्ध कर दिया — “राजपूतानी का मान, राजा के प्रेम से भी बड़ा होता है।”

उनका रूठना शिकायत नहीं थी, वह एक घोषणा थी — कि रिश्तों की नींव विश्वास है, और विश्वास टूटे तो महल भी सूने लगते हैं।

इसीलिए आज 500 साल बाद भी हम कहते हैं — कुछ रानियां राज करके अमर होती हैं, और कुछ रूठकर। उमादे भटियानी दूसरी थी।

नरसा राम जांगु
राजस्थान

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!