संक्षिप्त लेख: विनाश काले विपरीत बुद्धि – श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’ ( सुरेंद्रनगर-गुजरात)

तृष्णा ऐसी चीज है कि जब बढ़ती जाती है तो अहंकार बढ़ता जाता है और उस अहंकार की बलि ना जाने कितने घर,परिवार,देश और संस्कृतियाँ चढ़ जाती हैं उनको तब तक समझ नहीं आता जब तक पूरी तरह सब ख़तम नहीं हो जाता इसीलिए कहते हैं कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि। जानते हैं इससे फायदा नहीं होगा परन्तु अहंकार का दामन नहीं छोड़ते। पिताजी के कंधे ही वो रनवे हैं जहाँ से बच्चों के सपनों की उड़ान शुरू होती है।जिन के कांधों पर ज़िम्मेदारियों के बोझ हो। उन्हें रुठने और टूटने का कोई हक़ नहीं होता। अनुमान गलत हो सकता है पर अनुभव कभी गलत नहीं होता क्योंकि अनुमान हमारे मन की कल्पना है और अनुभव हमारे जीवन की सीख है।माना जाता है कि पाप करना गलत है लेकिन पुण्य करके किसी की सहायता करके उसका अहंकार उस से भी खराब होता है।अहंकार ऐसा मेहमान हैं जो आता तो अकेला हैं लेकिन जाते जाते सब रिश्ते साथ ले जाता है। ज़िन्दगी के इस सफर में हम सब एक मुसाफिर हैं।अहंकार न करें प्रेम से रहें मृदुल व्यवहार उपहार है।बदल गई है रंगत जमाने की आजकल वही अनजान बनते हैं ।जो सब कुछ जानते हैं घमंड एक मानसिक बीमारी हैं ।जिसका इलाज सिर्फ कुदरत और वक़्त करता हैं।चाहे आप कितने भी अच्छे क्यों ना हो लेकिन अगर आप गलत जगह पर होंगे तो आपकी कीमत धूल बराबर ही होगी। खुद को क्या करना है वो पता नहीं मगर दूसरों को क्या करना चाहिए उसकी सलाह सबके पास है।ज़िंदगी में कुछ सीखो या ना सीखो मगर लोगों को पहचानना ज़रूर सीखो। क्योंकि जैसे लोग दिखते हैं वैसे होते नहीं हैं। गलत लोग आपकी अच्छाई से भी नफरत करते हैं और सही लोग आपमें बुराई जानकर भी आपसे प्यार करते हैं यही संबंध की परिभाषा है।कर्म ही हमारा बीज है कर्म से ही हमारा बंधन है कर्म से ही हमारे मुक्ति है कर्मों का फल हमारा भाग्य है।
“संगत करिए नेक की शुद्ध होय आचार,
घटे दुष्ट के संग से विद्या बल सदाचार।”
श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’
( सुरेंद्रनगर-गुजरात)




