दीप जो स्वयं जल उठा- कविता साव पश्चिम बंगाल

एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ा कुम्हार रहता था। उसके हाथों में ऐसी कला थी कि मिट्टी भी मानो मुस्कुरा उठती थी। वह सुंदर-सुंदर दीपक बनाता, लेकिन अब लोग बिजली की रोशनी में इतने अभ्यस्त हो गए थे कि उसके दीपक कोई खरीदता ही नहीं था।
एक दिन उसका दस वर्षीय पोता बोला, “दादाजी, जब कोई दीपक खरीदता ही नहीं, तो आप इन्हें बनाते क्यों हैं?”
कुम्हार मुस्कुराया और बोला, “बेटा, दीपक का काम बिकना नहीं, जलना है। जो अपने हिस्से का प्रकाश दे दे, वही उसका जीवन है।”
कुछ दिनों बाद गाँव में भीषण आँधी आई। बिजली के खंभे गिर गए और पूरा गाँव अंधकार में डूब गया। तब लोगों को उसी बूढ़े कुम्हार की याद आई। उसके घर में सैकड़ों मिट्टी के दीपक रखे थे।
उसने बिना किसी शिकायत के सबको दीपक और तेल बाँट दिया। थोड़ी ही देर में पूरा गाँव दीपों की पंक्तियों से जगमगा उठा। लोगों के चेहरों पर लौटती मुस्कान देखकर बूढ़े कुम्हार की आँखें नम हो गईं।
गाँव के मुखिया ने कहा, “आज समझ में आया कि असली उजाला बिजली नहीं, किसी के मन की उदारता करती है।”
बूढ़ा कुम्हार मुस्कुराया और बोला, “दीपक कभी अपने लिए नहीं जलता। उसका सौभाग्य तो दूसरों का अंधकार दूर करने में है।”
उस दिन के बाद गाँव के लोगों ने न केवल उसके दीपक खरीदने शुरू किए, बल्कि उसके सम्मान में हर दीपावली पहला दीप उसी के हाथों से जलाने की परंपरा भी बना ली।
शिक्षा:
जीवन का वास्तविक मूल्य इस बात में नहीं कि हमें कितनी पहचान मिली, बल्कि इस बात में है कि हमारे कारण कितनों के जीवन में उजाला पहुँचा।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




