अहंकार विनाश का कारण — सपना बबेले स्वरा झांसी उत्तर प्रदेश

मनुष्य के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास का होना आवश्यक है, परंतु जब यही आत्मविश्वास अपनी सीमाएँ लाँघकर अहंकार का रूप धारण कर लेता है, तब वह पतन का कारण बन जाता है। अहंकार मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित कर देता है। उसे अपनी शक्ति, ज्ञान और पद का इतना अभिमान हो जाता है कि वह दूसरों का सम्मान करना भूल जाता है। यही स्थिति उसके विनाश की शुरुआत होती है।
भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों में अहंकार को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। रामायण में रावण अत्यंत विद्वान, पराक्रमी और शिवभक्त था, किंतु अपने अहंकार के कारण उसने मर्यादाओं का उल्लंघन किया और अंततः उसका सर्वनाश हुआ। महाभारत में दुर्योधन का अहंकार भी पूरे कुरुवंश के विनाश का कारण बना। ये उदाहरण बताते हैं कि अहंकार चाहे ज्ञान का हो, शक्ति का हो या धन का—उसका परिणाम सदैव दुखद होता है।
अहंकारी व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करता। वह दूसरों की सलाह को महत्व नहीं देता और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। इससे उसके संबंध बिगड़ते हैं, समाज में सम्मान घटता है और वह धीरे-धीरे अकेला पड़ जाता है। अहंकार मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल देता है, जिससे वह सही और गलत का निर्णय भी नहीं कर पाता।
इसके विपरीत, विनम्रता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। जो व्यक्ति नम्र रहता है, वह निरंतर सीखता है, सबका सम्मान करता है और जीवन में स्थायी सफलता प्राप्त करता है। फल से लदा हुआ वृक्ष सदैव झुक जाता है; उसी प्रकार महान व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के बाद भी विनम्र बने रहते हैं।
अतः हमें अपने जीवन से अहंकार का त्याग कर विनम्रता, प्रेम और सद्भाव को अपनाना चाहिए। यही गुण हमें सच्चे अर्थों में महान बनाते हैं। वास्तव में, अहंकार विनाश का कारण है, जबकि विनम्रता विकास और सम्मान का आधार है।
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