लघुकथा: कश्मकश- पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)

अमृतभाई और अरुणाबेन को एकलौता बेटा अशोक था।वो बचपन से जिद्दी स्वभाव का था। थोड़ा स्वछंदी भी बन गया था।अमृतभाई छोटी कंपनी में नौकरी करता था। पगार ज्यादा नहीं थे। घर का गुजारा कर लेता था।अशोक ग्यारहवीं कक्षा में आया तब उसने मम्मी से कहा;’ मम्मी,सब लड़के एक्टीवा लेकर स्कूल आते हैं मुझे भी एक्टिवा चाहिए’। दोपहर की गर्मी,पृथ्वी पर अग्निज्वाला बरस रही थी, गलियों में सुनकर व्याप्त था। ऐसे समय अमृतभाई कंपनी से घर आया तो अरुणाबेन ने कहा;’अशोक एक्टिवा लेने की बात कर रहा था’। यह सुनकर अमृतभाई के दिमाग में ओर गर्मी चढ़ गई। मन पर थोड़ा अंकुश रखा। अशोक को बुलाया पास बैठकर शांति से समझाने की कोशिश की। पिता ने शांति से कहा;’बेटा,अभी मकान का हप्ता भर रहे हैं मोटरसाइकिल भी खरीदा अभी हमारे पास ऐसी जोगवाई नहीं है समय रहते ले लेंगे। अशोक ने कहा;’ नहीं मुझे तो अभी एक्टिवा चाहिए’। अशोकने एक्टीवा लेने की जीद पकड़ी। स्कूल जाना बंद कर दिया। गुमसुम रहने लगा था।
अशोक के एसे वर्तन से माता-पिता को चिंता होने लगी थी। करें तो क्या करें। अमृतभाई कश्मकश में पड़ गए। विचार करने लगे। अशोक को फिर से समझने की कोशिश की कहां;’बेटा तुम हमारे एकलौते बेटे हो। यह सब हम तुम्हारे लिए ही कर रहे हैं। ऐसी समझ भरी बात का अशोक पर कोई असर न पड़ा। अमृतभाई ने कंपनी में से कर्ज लेकर अशोक को कहां;’ अशोक तुझे जो पसंद आए एक्टिवा पसंद कर ले’। अशोक ने चिल्लाकर कहां :’अब मुझे एक्टिवा नहीं चाहिए’। जब मैंने कहा तब आपने क्यों मना कर दिया। पिताजी ने बेटे के सामने कुछ ना कहा। बेटा तब हमारे पास पैसे नहीं थे। मैंने कंपनी में से कर्ज लिया। लाख कोशिशें के बाद भी अशोक टच से मस न हुआ।अशोक की एसी जिद के कारण उसका अभ्यास बिगड़ा। माता-पिता को दुःख हुआ। संतानों को अपने परिवार की परिस्थिति का ख्याल रखना चाहिए। माता-पिता अपने बच्चों के लिए सब कुछ करता है। अपना मौज शौक भूलकर अपनें संतानों का मोज शोख पूरा करता है।यह बात संतानों को समझने की आवश्यकता है। परिवार दुःखी हो ऐसी हरकतें संतानों को नहीं करनी चाहिए। तभी परिवार में शांति बनी रहती है। परिवार को केमेरे में कैद करना आसान है लेकिन परिवार को एक साथ जुड़े रहना बहुत कठिन है।मधुरता केवल वाणी में ही नहीं मधुरता हमारे व्यवहार में चाहिए मधुरता हमारी सोच में चाहिए जीवन जीवन हमारा मधुर हो जाता है।जिसके पास है सद् व्यवहार वह वास्तव में है सबसे अमीर। अच्छी सोच व मधुर व्यवहार
सम्मान पाते हैं जैसे परमवीर।
“मात पिता का जो करे निज बेटा अपमान,
ऐसे बेटों से भला रहना जी निःसंतान।”
पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)




