लेख: बहुभाषी भारत में हिन्दी की भूमिका लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

आधुनिक हिन्दी जिसे खड़ी बोली के नाम से भी जाना जाता है वैदिक संस्कृत, लोक संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट और शौरसेनी अपभ्रंश के दौर से गुज़र कर अपनी विकास यात्रा पूरी करती है और आधुनिक हिन्दी के रूप में 19 वीं शताब्दी ईस्वी में स्थापित हो जाती है। आधुनिक हिन्दी को इस मुकाम तक पहुंचाने में अमीर खुसरो और 1600 शताब्दी ईस्वी के भक्तिकालीन कवियों कबीरदास, तुलसीदास, इत्यादि तथा 19वीं शताब्दी ईस्वी में हुए हिन्दी लेखकों लल्लू लाल, सदल मिश्र, इत्यादि का महत्वपूर्ण योगदान है।
देश के 52 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी को अपनी पहली भाषा या मातृभाषा के रूप में मानते हैं जो भारत की जनसंख्या का 43.63% है। इसके अतिरिक्त, लगभग 57% भारतीय हिन्दी भाषा को जानते-समझते हैं। इसके बावजूद भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं मिला। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयासों का सबसे अधिक विरोध दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु से होता है। अपनी मातृभाषा से प्रेम करना और उसका संवर्धन करना हर प्रदेश का अधिकार है। केन्द्र सरकार किसी भी अहिन्दी भाषी प्रदेश पर हिन्दी भाषा को थोपे जाने को अनुचित मानती रही है। अतः हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के उत्तर भारतीयों के आग्रह को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने हिन्दी को राजभाषा का दर्ज़ा दे रखा है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में मुझे हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। प्रादेशिक सरकारें भले ही अपने राजनैतिक हितों के वास्ते हिन्दी का विरोध करती हों लेकिन वहाॅं की जनता उत्तर भारत से संवाद करने के लिए हिन्दी को एक सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग करती है। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक फैले भारत मे कामचलाऊ हिन्दी बोलते हुए लोग मिल जाते हैं। अतः मेरी नज़र में, बहुभाषी भारत में हिन्दी की वर्तमान भूमिका उत्तर भारत में पहली अथवा मातृभाषा और शेष भारत में एक सम्पर्क भाषा की है।
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