आंखें -डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

मानव-देह में आँखें केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि अंतर्मन और बाहरी संसार के बीच खुलने वाली वह खिड़की हैं, जहाँ भावनाएँ बिना शब्दों के अपना परिचय देतीं हैं। शब्द जहाँ अर्थ की सीमाओं में बँध जाते हैं, वहाँ आँखें अक़्सर उस अनकहे को कह जाती हैं, जिसे मन कह नहीं पाता। कभी वे शांत झील-सी स्थिर होती हैं, तो कभी उनमें उमड़ते समुद्र की बेचैनी दिखाई देती है।
सुख हो या दुःख, प्रेम हो या विरह, आशा हो या निराशा,आँखें मन की सबसे विश्वसनीय साक्षी बनी रहतीं हैं। प्रसन्नता में उनमें अनायास चमक उतर आती है और पीड़ा में वही चमक नमी बनकर पलकों पर ठहर जाती है। क्रोध की ज्वाला, करुणा की कोमलता, भय की हलचल और आश्चर्य की चमक, मानवीय भावनाओं की कितनी ही परतें इन नयनों में प्रतिबिंबित होती रहती हैं। मनोविज्ञान भी आँखों की गतिविधियों को मनःस्थिति से जोड़कर देखता है। प्रकाश और भावनात्मक उत्तेजना के अनुसार पुतलियों का आकार बदल सकता है। तनाव, एकाग्रता या उत्तेजना के समय पलक झपकने की गति में परिवर्तन दिखाई दे सकता है। किसी दृश्य, स्मृति या विचार के प्रति हमारा ध्यान भी दृष्टि की दिशा और स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। किंतु इन संकेतों को किसी व्यक्ति की भावना का निश्चित प्रमाण नहीं माना जा सकता; उनके अर्थ को समझने के लिए परिस्थिति और व्यवहार को साथ देखना आवश्यक है। आँखों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मौन होकर भी संवाद करतीं हैं। किसी प्रिय की प्रतीक्षा में ठहरी दृष्टि हो या विदाई के क्षण में नम हुई पलकें, इनमें ऐसी कथाएँ लिखीं होतीं हैं, जिनके सामने शब्द छोटे पड़ जाते हैं।
‘शब्द सँभल न पाए,
थकी ज़ुबाँ हार गई,
मौन आँखें कह गईं
जो बात दिल में रह गई।’
शायद इसीलिए आँखों को आत्मा का दर्पण कहा जाता है। वे केवल संसार को देखतीं नहीं, भीतर के संसार को भी प्रतिबिंबित करतीं हैं। उन्हें पढ़ने के लिए दृष्टि नहीं, संवेदना चाहिए!क्योंकि आँखों का सच्चा आख्यान शब्दों में नहीं, मौन में लिखा जाता है।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




