सन्घर्ष से सफलता तक-उर्मिला मोर बरहामपुर ओडीसा

सन्घर्ष से सफलता तक उसका नाम था लक्ष्मी आंखें खोलने के साथ ही उसने अपने घर में दरिद्रता का साम्राज्य देखा पिताजी दिहाडी मजदूर थे और मां तपेदिक की मरिज थी ऐसे में पिता को जिस दिन मजदूरी मिल जाती उस दिन घर में 2 जून की रोटी नसीब होती, नहीं तो फाका करने की नौबत रहती थी। ऐसे में पढ़ाई के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात है लक्ष्मी को पढ़ने की बहुत इच्छा थी अपने घर के सामने से बच्चों को बस्ता लेकर स्कूल जाते हुए देखती तो वह भी सोचती काश मैं भी ऐसा कर पाती कहते हैं ना कि प्रयास करते रहो एक दिन मंजिल मिलती ही है उसे एक सर्व शिक्षा अभियान विद्यालय में पढ़ने की अनुमति मिल गई उसने आठवीं तक जी जान से पढायी की उसके बाद उसके पिता ने उसकी शादी करने का निर्णय किया उसने बहुत हाथ पाॅव जोड़े की मेरे को अभी पढ़ना है पर पिता ने उसकी एक न सुनी। उन्होने उससे उमर मे दुगुने व्यक्ति से शादी कर दी। यहां तो और भी खराब स्थिति थी पति दिहाड़ी मजदूर था जो अपनी कमाई दारू में उड़ा देता था ऐसे करते-करते उसके तीन बच्चे हुए ।पति के अत्यधिक दारू पीने से उसके दोनों गुर्दे खराब हो गए और वह भी एक दिन दुनिया छोड़कर चला गया जो थोड़ा बहुत सहारा था ।वह भी छिन गया अब वह क्या करें ?लेकिन उसने हार नहीं मानी उसने तीन-चार घरों में काम करके कैसे भी अपना अपने बच्चों का भरण पोषण किया पर उसकी एक बचपन की जो इच्छा थी ‘शिक्षा’ वह चाहती थी कि मेरे बच्चे शिक्षित हो। पर हो कैसे ? एक दिन जो वो3_ 4घरों में काम करती थी उनमे से एक घर की मालकिन बहुत दयालु थी जब उसने उसके सपनों के बारे में सुना तो उसने चार-पांच घरों से पैसे इकट्ठे करके उसे लक्ष्मी को दिए उसने इन पैसो से उसने अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाया। उसके बच्चे भी अपनी मां का संघर्ष देखते हुए हर कक्षा में टॉप करते गए उसकी बड़ी बैटी जिसका नाम रमा था वह चाहती थी कि मैं डॉक्टरी की पढ़ाई करूं ,पर डॉक्टर की पढ़ाई करने के लिए पैसे कहां थे दिन मे उसने अपनी पढ़ाई के लिए कई ट्यूशन लिए और कई जगह पर उसने अंशकालीन नौकरी की। और रात में वह जागकर पढ़ाई की आखिर उसकी कोशिश भी रंग लायी उसे मेडिकल में दाखिला मिल गया वहां पर उसने अत्याधिक मेहनत करके स्कॉलरशिप प्राप्त की उस स्कॉलरशिप के पैसों से उसने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की जिस दिन वह डॉक्टर की वरदी पहन के अपने मोहल्ले में आई तो उसका फूल ढोल नगाडा से बहुत स्वागत किया गया। इसी तरह उसका बेटा जो अभी किशोरावस्था में था अपनीदीदी का पढ़ाई के कारण इतना मान सम्मान देखकर उसने भी आईएएस बनने का निश्चय किया पर हर जगह पैसों की बाधा थी पर जो कहते हैं ना कि जहां आप में सच्चे दिल से कुछ करने को जुनून हो तो वहां प्रकृति भी उसका साथ देती है तो उसने उसने भी छोटे-मोटे काम करके,किसी तरह से पैसो का जुगाड कर आइ ए एस मे ज्वाइन किया और अच्छे रैंक में पास हुआ जिस दिन वह मोहल्ले में आया मोहल्ले के लोग घरों से कहते हैं देखो आज हमारे मोहल्ले में एक जिला कलेक्टर बन गया यह सुनकर उसकी मां की छाती गर्व से फूल उठती थी इसी तरह तीसरी बेटी ने भी इंजीनियरिंग किया अब उसके तीनों बच्चों के पढायी की रोशनी से पूरा मोहल्ला जगमगा रहा था और सब बधाइयां पर बधाइयां दे रहे थे कहते थे कि हमारे मोहल्ले में गुडली के लाल है। वे बच्चे और उनकी माॅ उस दयालु महिला के पास उनका आभार प्रकट करने के लिए गये तो उसने यही कहा कि मैंने जो किया है एक अपना फर्ज समझ के किया है। पर बच्चों मेरे को अगर दिल से धन्यवाद देना है तो तुम भी जिन बच्चों की आंखों में पढ़ने की ललक हो उनको शिक्षा प्राप्त कराने में उनके सहयोगी बनो।ऐसे ही तो करके एक दीप से जैसे हजारों दीप जल जाते हैं वैसे ही तुम लोगों से पूरा मुहल्ला शिक्षा के आलोक से जगमगा उठे। कहते हैं ना कि एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता पर अकेला चना भी अपने राह पर सच्चे दिल से चले उसके पीछे-पीछे अपने आप कारवा बनता जाता है। तो ऐसी महिला को हम शत-शत बार नमस्कार करते हैं दोस्तों यह कहानी वास्तविकता पर आधारित है इसमें नाम पात्र बदल दिए गए हैं
उर्मिला मोर
बरहामपुर ओडीसा




