काव्य संग्रह — यादों का मौसम — कवयित्री पूजा अग्रवाल
*विषय और केंद्रीय भाव*
“यादों का मौसम” नाम से ही साफ है कि यह कृति अतीत के गलियारों में ले जाने वाली है। पूजा अग्रवाल ने इस किताब में यादों को सिर्फ एक भावुकता के तौर पर नहीं देखा, बल्कि उन्हें मौसम की तरह बदलते, बरसते और तपते हुए दिखाया है। हर पाठक के जीवन में कोई न कोई ऐसी वजह होती है जिसके ज़रिए वह अपने बचपन, पहले प्यार, बिछड़न और अधूरे ख्वाबों को जी लेता है। किताब का केंद्रीय भाव यही है कि यादें मरती नहीं, वे बस मौसम बदल लेती हैं।
*भाषा शैली और शिल्प*
पूजा अग्रवाल जी की भाषा बेहद सरल पर असरदार है।उनकी गद्य-कविताओं का भाव एक अलग लय देता है। वे बड़े-बड़े दार्शनिक शब्दों से बचती हैं। आम बोलचाल के शब्दों में गहरी बात कह जाना उनकी खासियत है। किताब को चार हिस्सों में बाँटा गया है: सावन, बसंत, पतझड़ और लू। हर हिस्सा एक मौसम के साथ जुड़ी याद को बयान करता है। ये ढाँचा किताब को बिखरने से बचाता है और पाठक को एक सफर पर ले जाता है।
*सबसे मज़बूत पक्ष*

1. *रिलेटेबिलिटी*: किताब पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखिका ने अपनी यादों को एक सूत्र में पिरोया है।हर चीज़ इतनी अपनी सी लगती है।
2. *स्त्री मन का चित्रण*: पूजा अग्रवाल ने एक लड़की के बड़े होने की यात्रा को बहुत ईमानदारी से लिखा है। समाज की बंदिशें, खुद से लड़ाई और फिर खुद को अपनाने का सफर। ये हिस्सा खासकर युवा पाठिकाओं को बहुत हिम्मत देगा।
3. *सकारात्मक अंत*: यादों की किताबें अक्सर उदासी में खत्म होती हैं। पर यहाँ लेखिका यादों को ताकत बनाती है। आखिरी पन्नों में वो कहती हैं कि यादें बोझ नहीं, पंख हैं। ये नज़रिया किताब को मोटिवेशनल टच देता है।
*किसे पढ़नी चाहिए*
अगर आप गुलज़ार, जावेद अख्तर और अमीता पारेख की लेखनी पसंद करते हैं तो ये किताब आपके लिए है। 16 वर्ष से ऊपर का हर वो शख्स जिसने कभी किसी को शिद्दत से याद किया हो, इसे एक बैठक में खत्म कर देगा। इंस्टाग्राम रील्स की तेज़ दुनिया से 2 घंटे का ब्रेक लेकर अगर सुकून चाहिए तो “यादों का मौसम” सही चुनाव है।
अंतिम बात
500 पन्नों की मोटी किताबों के दौर में 110 पन्नों की ये छोटी सी किताब बड़ा असर करती है। ये आपको रुलाती है, हँसाती है और आखिर में गले लगाकर कहती है कि चलो, अब आगे बढ़ते हैं। पूजा अग्रवाल ने यादों को शिकायत नहीं, शुक्रिया बनाकर पेश किया है। यही बात इस किताब को खास बनाती है।
डॉ संजीदा खानम “शाहीन”
(शायरा ,लेखिका एक्यूप्रेशर थेरेपिस्ट)




