वेद उपनिषद संबंधित—–डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

महाभारत के युद्ध रण क्षेत्र में स्थित अर्जुन की मन: स्थिति असमंजस को प्राप्त होती है, वह आत्मा और परमात्मा के रहस्य को नहीं समझते हुए किंतु पूर्व विदित कृष्ण जी के द्वारा मार्गदर्शन करने के तदुपरांत आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। आत्मसात किया।
कृष्ण जी मानव कल्याण अर्थ के लिए कर्तव्य परायणता हेतु कर्म फल महत्व को अति उत्कृष्ट स्थान देते हैं।
अर्जुन को परामर्श देते हुए बोलते हैं तू अपने हाथ में शस्त्र को संभाल कर, कर्म निष्ठता की ओर अग्रसर होकर धर्म का पालन करते हुए कर्म निरत एक स्थान पर विशिष्ट कुश आसान को ग्रहण करे ,भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षाकृत सांसारिक कर्म में लीन होकर के ,भक्ति कर्म को अपनाना श्रेष्ठ है, दोनों के मध्य समन्वय आत्मसात करके ही हठयोगी कुंडलिनी का पालन करके, अपने इंद्रियों पर नियंत्रण करके एकीकृत स्थितप्रज्ञ, मनन चिंतन करके, निस्वार्थ एकाग्रता से स्वमन, तन निर्वहन अर्थात तभी जीवन सार्थक होगा।
अतः धर्म, कर्म, और सांसारिक इन तीनों महत्वपूर्ण स्थितियों में अपने को समन्वय स्थापित करते हुए कर्म की ओर उन्मुख , अग्रसर हो जा, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकता है, यही सार्थक, उपयुक्त और उचित है। इस प्रकार का संदेश महत्वपूर्ण जिसे संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं।
यही हमारे हिंदू संस्कृति पुराणो की महत्ता का प्रतिपादन है। समय अनुरूप पूर्ण रूप से परिपालन आचरण में उतरना चाहिए।
डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी




