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अहंकार – सुनीता तिवारी”सरस” आलेख

 

अहंकार मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाली एक ऐसी नकारात्मक भावना है, जो धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व को खोखला कर देती है। यह वह मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और अपने गुणों, ज्ञान या संपत्ति का अत्यधिक गर्व करने लगता है। अहंकार का जन्म प्रायः सफलता, शक्ति, धन या प्रशंसा के कारण होता है, लेकिन यही अहंकार आगे चलकर व्यक्ति के पतन का कारण बन जाता है।

जब मनुष्य अहंकारी हो जाता है, तो वह दूसरों की भावनाओं और विचारों का सम्मान करना भूल जाता है। उसे लगता है कि वही सर्वश्रेष्ठ है और उसका निर्णय ही अंतिम है। यही सोच उसके संबंधों में दरार डालती है। परिवार, मित्र और समाज के लोग उससे दूर होने लगते हैं। धीरे-धीरे वह अकेला पड़ जाता है, लेकिन अपने अहंकार के कारण उसे इसका अहसास भी नहीं होता।

अहंकार केवल सामाजिक जीवन को ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक विकास को भी बाधित करता है। एक अहंकारी व्यक्ति कभी सीख नहीं पाता, क्योंकि उसे लगता है कि उसे सब कुछ पहले से ही ज्ञात है। जबकि सच्चा ज्ञान विनम्रता में निहित होता है। विनम्र व्यक्ति ही नए विचारों को स्वीकार करता है और निरंतर प्रगति करता है। इसी कारण कहा गया है कि “विनम्रता ही ज्ञान का द्वार है।”

इतिहास और पुराणों में भी अहंकार के अनेक उदाहरण मिलते हैं। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे शक्तिशाली पात्र अपने अहंकार के कारण ही नष्ट हो गए। उनके पास शक्ति, ज्ञान और सामर्थ्य सब कुछ था, लेकिन अहंकार ने उन्हें अंधा बना दिया। इसके विपरीत, भगवान राम और श्रीकृष्ण जैसे आदर्श पात्रों ने सदैव विनम्रता और धर्म का मार्ग अपनाया, जिससे वे आज भी पूजनीय हैं।

अहंकार से बचने का एकमात्र उपाय आत्मचिंतन और विनम्रता है।

सुनीता तिवारी”सरस”

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