मटके का पानी – रमेश शर्मा

एक समय था लोगों के पास पैसा कम था। लेकिन व्यवहारिकता थी। व्यक्ति थोड़े में सुखी था। धरम करम पर विश्वास करता था। परिवार के अलावा समाज और दीन व असहाय लोगों के बारे में भी सोचता था।
जब हम छोटे थे तो गाँव में गर्मियों की छुट्टियां में जाते थे। आस पड़ोस के सभी लोग खुश होते थे हमारे दादा दादी चहक कर सभी को बताते थे। शहर से बच्चे छुट्टियां मनाने आये हैं।
घर घर में मटके रहते थे। शीतल जल पीने को मिलता था। जिस किसी के घर में चले जाते वह कुछ न कुछ खाने पीने को देता था। पूरे दिन मौज मस्ती में निकल जाता था।
आज लोगों के पास समय नहीं है। अगल बगल में कौन रहा है किसी को जानने की फुर्सत नहीं है। कोई गर्मी की छुट्टियों में अपने बच्चो के को गाँव नहीं ले जाता है।
गर्मियों में बच्चों को और नई नई हाबी क्लासेज जोइन करवा देते हैं। घर वालों का मानना है कि बच्चों को सभी क्षेत्रों में पारंगत बनाया जाए। वह फालतू ना रहे।
धन्यवाद
रमेश शर्मा




