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लघुकथा —  नई रोशनी–सुनीता तिवारी”सरस”

 

सीमा रोज़ की तरह खिड़की के पास बैठी थी। बाहर धूप खिली थी, पर उसके मन में अंधेरा छाया हुआ था। कुछ महीनों पहले ही उसके पति का देहांत हुआ था, और तब से जीवन जैसे थम-सा गया था। घर के हर कोने में उनकी यादें बसी थीं, जो उसे और भी अकेला कर देतीं।

एक दिन उसकी छोटी बेटी ने आकर उसका हाथ थामा और बोली, माँ, आप हमेशा उदास क्यों रहती हो? पापा कहते थे ना, आप सबसे मजबूत हो। बेटी की मासूम आँखों में विश्वास की चमक थी।

सीमा चुप रही, पर उसके भीतर कुछ हलचल हुई। उसने महसूस किया कि वह अपने दुख में इतनी डूब गई थी कि अपनी बेटी की मुस्कान भी भूल गई थी। उसी क्षण उसने तय किया कि अब वह टूटेगी नहीं, बल्कि अपनी बेटी के लिए जीएगी।

अगले दिन से उसने अपने पुराने शौक चित्रकला को फिर से अपनाया। धीरे-धीरे रंगों ने उसके जीवन में फिर से जगह बनानी शुरू कर दी। उसकी बनाई पेंटिंग्स लोगों को पसंद आने लगीं और उसे एक नई पहचान मिलने लगी।

कुछ ही महीनों में सीमा की दुनिया बदल गई। अब उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और उम्मीद की चमक थी। उसने समझ लिया था कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी उम्मीद की किरण ही नई रोशनी बन सकती है।

सुनीता तिवारी”सरस”

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