‘मुंशी प्रेमचंद और पाश्चत्य साहित्य: तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य’ – -डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

मुंशी प्रेमचंद और उनके लोक-केंद्रित यथार्थवादी साहित्य की तुलना मुख्य रूप से अंग्रेजी साहित्य के दो महान कथाकारों के साथ की जाती है:
1. चार्ल्स डिकेंस :-
समानता का आधार:
जिस प्रकार चार्ल्स डिकेंस ने विक्टोरियन युगीन इंग्लैंड के कारखानों, बाल-श्रम, ग़रीबों के शोषण और सामाजिक विसंगतियों को अपने उपन्यासों (जैसे ‘डेविड कॉपरफील्ड’ या ‘ऑलिवर ट्विस्ट’) का केंद्र बनाया, लगभग वैसा ही चित्रण प्रेमचंद के उपन्यासों में भारतीय परिवेश के अंतर्गत मिलता है।
पात्र-विधान और संवेदनशीलता: दोनों ही लेखकों की रचनाओं में समाज के उपेक्षित, शोषित और निचले तबके के पात्रों के प्रति गहरी सहानुभूति और करुणा दिखाई देती है। हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करने की शैली दोनों में समान रूप से पाई जाती है। आलोचकों ने कई बार प्रेमचंद की लेखन शैली और सामाजिक दृष्टि को भारतीय संदर्भों में ‘चार्ल्स डिकेंस’ के समकक्ष माना है।
2. थॉमस हार्डी
समानता का आधार: थॉमस हार्डी के उपन्यासों (जैसे ‘टेस’ या ‘मेयर ऑफ़ कैस्टरब्रिज’) में ग्रामीण जीवन, किसानों की विवशता, प्रकृति और भाग्य के थपेड़ों से जूझते आम इंसान का अत्यंत मार्मिक और यथार्थवादी चित्रण मिलता है।
किसान जीवन का यथार्थ: प्रेमचंद ने भी भारतीय ग्रामीण समाज, महाजनों के चंगुल में फंसे किसानों और कृषि-व्यवस्था के त्रासद यथार्थ को ‘गोदान’ और ‘कर्मभूमि’ जैसी कृतियों में उकेरा है। इस दृष्टि से ग्रामीण जीवन और उसकी समस्याओं के आख्यान के मामले में प्रेमचंद और थॉमस हार्डी के बीच वैचारिक और संवेदनात्मक साम्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।




