एथेनॉल पर आज की बहस से आगे बढ़कर कल की ऊर्जा सुरक्षा को देखना होगा ।लोकेश झा।

चीनी भी चाहिए, किसान की समृद्धि भी और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत भी। जरूरत संतुलित नीति की है। आज देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लेकर बहस तेज है। गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने से चीनी की उपलब्धता पर असर पड़ने और कीमतों पर दबाव की आशंका जताई जा रही है। यह चिंता महत्वपूर्ण है, लेकिन चीनी की कीमतों के पीछे उत्पादन, मौसम और मांग जैसे अन्य कारणों को भी ध्यान में रखना होगा।
भारत पेट्रोलियम जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। घरेलू एथेनॉल पेट्रोल के एक हिस्से का विकल्प बनता है और कच्चे तेल के आयात तथा विदेशी मुद्रा खर्च को कम करने में मदद कर सकता है। इसका लाभ पेट्रोल की कीमत में तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है, क्योंकि कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल, टैक्स, रिफाइनिंग और परिवहन सहित कई कारकों पर निर्भर करती हैं। एथेनॉल का बड़ा लाभ दीर्घकाल में ऊर्जा सुरक्षा के रूप में सामने आ सकता है।
एथेनॉल की बढ़ती मांग किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध करा सकती है। हालांकि गन्ना पानी की अधिक आवश्यकता वाली फसल है, इसलिए केवल एथेनॉल के लिए गन्ने का उत्पादन बढ़ाना उचित नहीं होगा। पानी, खाद्य सुरक्षा, चीनी की जरूरत और किसान की आय के बीच संतुलन जरूरी है।
गन्ने के साथ मक्का, चावल और अन्य उपयुक्त स्रोतों से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। इससे चीनी की उपलब्धता पर दबाव कम करने के साथ ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत भी मजबूत किए जा सकते हैं। बहु-कच्चा माल आधारित एथेनॉल उत्पादन की दिशा में कदम इस संतुलन को मजबूत कर सकते हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि नीति ऐसी हो जिससे किसान को लाभ मिले, उपभोक्ता पर अनावश्यक बोझ न पड़े और देश की विदेशी तेल पर निर्भरता लगातार कम हो। सामाजिक चेतना का तकाजा है कि आज के लाभ और तत्काल समस्याओं के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों की ऊर्जा सुरक्षा को भी ध्यान में रखा जाए। ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ते हुए खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और किसान हितों के बीच संतुलन बनाना ही दूरदर्शी नीति की पहचान होगी।




