आज कितना सुन्दर संगम है आज तीन पर्व एकसाथ हैं। -मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

आज हरितालिका तीज है।
सावन की भीगी हवा में मेहँदी की खुशबू लिए भादों की तीज आई है। हथेलियों पर सजे रंगों में किसी के लिए प्रेम है, किसी के लिए प्रार्थना, और किसी के लिए शिव-पार्वती-सा अटूट विश्वास बेहद खास।
आज गणेश चतुर्थी भी है।
हे विघ्नहर्ता मंगल कर्ता,गौरी पुत्र गणेश।
प्रथम पुज्य प्रभु आप है,काटो सारे क्लेश।।
सबके घर-आँगन में विराजे हैं मंगलमूर्ति गणराज,
छोटा कद, बड़े कान , बड़ा सूंड, बड़ा पेट उनके विग्रह का प्रत्येक अंग मानुष जीवन को प्रेरणा देता है।
आरती की लौ के साथ मन की सारी आशंकाएँ जैसे धीरे-धीरे पिघल रही हैं। हमने उनके चरणों में अपने विघ्न ही नहीं, अपने अधूरे सपने भी रख दिए हैं। इस विश्वास के साथ कि शुभ आरंभ कभी व्यर्थ नहीं जाता। जय हो गणपति बप्पा की
और आज हिंदी दिवस भी है।
हिन्दी से मिलता हमें, कितना सच्चा ज्ञान।
संस्कृति सारी साजती, सभी गुणों की खान।।
वह हिंदी, जो माँ की लोरी में घुली, दादी की कहानी में पली, गाँव की मिट्टी से उठी और शहरों तक चली आई। जिसके शब्दों से हम अपने भावों को लिखकर भीतर के भारीपन को हल्का कर लेते हैं। बिना किसी बनावट के वो हिन्दी है। जो हम हिन्दुस्तानियों की शान और पहचान है।
आज लगता है।
हम कितने महान देश के वासी है जहांँ हर दिन त्योहार सा खिलता है। आज तीज ने हमें प्रेम दिया, गणपति ने विश्वास, और हिंदी ने हमें अपनी पहचान।
तीनों अलग पर्व हैं, पर भीतर कहीं एक ही बात कहते हैं—
प्रेम बचाए रखो, विश्वास बनाए रखो, और अपनी जड़ों से जुड़े रहो।
क्योंकि जिस मन में प्रेम, विश्वास और अपनी भाषा तीनों जीवित हों, वही मन सच में समृद्ध होता है।
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’




