ऑटो का सफर — सुनीता तिवारी”सरस”

जीवन में कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो उस समय तो बिल्कुल साधारण लगती हैं, लेकिन बाद में वही पूरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत स्मृति बन जाती हैं। मेरी जिंदगी में भी एक ऐसा ही सफर आया था, एक छोटा-सा ऑटो का सफर, जिसने आगे चलकर जीवन की पूरी दिशा बदल दी।
वह हमारी पहली मुलाकात थी। ऑटो में साथ बैठे थे हम दोनों। शुरुआत में एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अनजान। संकोच और झिझक के बीच धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई। हाथ बढ़े और स्पर्श की वह हल्की-सी मधुर लहर आज भी मन को उसी पल में ले जाती है।
अभी तक हम अपनी-अपनी राहों के पंछी थे। पता नहीं था कि यह छोटी-सी मुलाकात जीवनभर का साथ बनने वाली है।
कुछ ही देर में स्टेशन आ गया। हम दोनों ऑटो से उतर गए। सामने रेल खड़ी थी। संकोच भरे कदमों से हम रेल में चढ़ गए। तभी खिड़की से एक हाथ मेरी ओर बढ़ा और उसमें एक उपन्यास था। मैंने उसे थाम लिया। जाते-जाते उनकी आँखों में झाँका, उन आँखों में कुछ ऐसा था, जिसे शब्दों में कहना आज भी कठिन है।
थोड़ी-सी बातचीत में ही मन जैसे किसी अनजाने विश्वास से भर गया। लगा, शायद यह मुलाकात यूँ ही नहीं हुई है। हमारी बातचीत सफल रही और भविष्य की मंजिल धीरे-धीरे तय होने लगी।
कुछ दिनों बाद वे मेरे स्थान पर आए। फिर मिलना-जुलना शुरू हुआ। बातचीत बढ़ी, एक-दूसरे को समझने का अवसर मिला और घूमते-फिरते कब मन एक-दूसरे के करीब आ गया, पता ही नहीं चला।
कुछ माह के अंतराल में हमारी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। दो अलग-अलग राहें एक हो गईं। उस दिन से आज तक जीवन के कितने ही मौसम आए और चले गए, उम्र भी बढ़ती गई, लेकिन उस पहले सफर की याद आज भी मन में वैसे ही ताजा है।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है,वह केवल ऑटो का सफर नहीं था, वह तो हमारे जीवन-सफर की पहली यात्रा थी।
उम्र के इस पड़ाव पर भी जब उस दिन को याद करती हूँ, मन मुस्कुरा उठता है। वह उपन्यास, वह रेल, वह संकोची-सी नजर और वह पहली मुलाकात,सब कुछ आज भी मेरे मन में प्रेम की एक मधुर स्मृति बन धड़कता है।
सुनीता तिवारी”सरस”




