चुनाव के दो चरण: पहले जनता के चरणों में नेता, फिर जनता नेता के चरण में

लेखक: जे पी शर्मा। जर्नलिस्ट
जयपुर । लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, अधिकार और भविष्य का फैसला होता है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज राजनीति में एक ऐसा दृश्य बार-बार देखने को मिलता है, जिसे देखकर लगता है कि चुनाव वास्तव में दो चरणों में होता है। पहले चरण में नेता जनता के चरणों में होता है और दूसरे चरण में जनता नेता के दरवाजे पर खड़ी दिखाई देती है।
पहला चरण: जब नेता को जनता भगवान नजर आती है।
चुनाव की घोषणा होते ही राजनीति के गलियारों में अचानक जनसेवा का ज्वार उमड़ने लगता है। वर्षों से बंद पड़े दरवाजे खुल जाते हैं। नेता जी गली-मोहल्लों में घूमने लगते हैं। हाथ जुड़ जाते हैं, सिर झुक जाते हैं, चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और जुबान पर सिर्फ जनता की सेवा का संकल्प होता है। कोई खुद को जनता का सच्चा सेवक बताता है, कोई गरीबों का मसीहा बनता है, तो कोई विकास की ऐसी तस्वीर दिखाता है कि मतदाता को लगता है, अब उसके सारे दुख-दर्द समाप्त होने वाले हैं। सड़क, पानी, बिजली, सफाई, रोजगार और सुरक्षा हर समस्या का समाधान चुनावी भाषणों में तैयार मिलता है। नेता जी कहते हैं, एक बार मौका दीजिए, क्षेत्र की तस्वीर बदल देंगे। जनता के लिए दिन-रात एक कर देंगे। आपके दरवाजे पर हमेशा उपलब्ध रहेंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये वादे जनता की समस्याओं के समाधान के लिए होते हैं या केवल सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए?
दूसरा चरण: जब जनता को नेता के दर्शन भी मुश्किल हो जाते हैं।
मतगणना होती है, जीत का प्रमाणपत्र मिलता है और गले में फूलों की मालाएँ पड़ते ही कई नेताओं का व्यवहार बदलने लगता है। चुनाव से पहले जो नेता हर घर में जाकर हालचाल पूछता था, वही अब मिलने के लिए समय नहीं होने की बात कहता है। कल तक जो फोन उठाकर समस्या सुनता था, आज उसके फोन पर जवाब मिलना मुश्किल हो जाता है। कल तक जो गली-गली घूम रहा था, आज जनता को अपने ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि तक पहुँचने के लिए सिफारिशों और परिचयों का सहारा लेना पड़ता है। जनता सड़क की समस्या लेकर जाती है, तो आश्वासन मिलता है। नाली की शिकायत करती है, तो फाइल आगे बढ़ाने की बात होती है। पानी और सफाई की समस्या बताती है, तो जिम्मेदारी दूसरे विभाग पर डाल दी जाती है। जनता पूछती रह जाती है जिस व्यक्ति को हमने अपना प्रतिनिधि चुना था, वह आखिर हमारी आवाज सुनने के लिए तैयार क्यों नहीं है?यहाँ एक कड़वा सच समझना जरूरी है कि प्रतिनिधि का कर्तव्य जनता पर शासन करना नहीं, बल्कि जनता की सेवा करना है। हर नेता ऐसा नहीं होता। आज भी अनेक जनप्रतिनिधि ईमानदारी से जनता के बीच रहते हैं, समस्याएँ सुनते हैं और विकास के लिए काम करते हैं। ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन जो लोग चुनाव के समय जनता को अपना परिवार बताते हैं और जीतने के बाद उसी परिवार को पहचानने से बचते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि लोकतंत्र किसी की निजी जागीर नहीं है। कुर्सी स्थायी नहीं होती। पद का कार्यकाल सीमित होता है, लेकिन जनता की याददाश्त और उसके अनुभव अगले चुनाव तक जीवित रहते हैं। जनता सब कुछ भूल जाए, यह मान लेना राजनीति की सबसे बड़ी भूल है। आज जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। केवल जाति, धर्म, रिश्तेदारी, भावनात्मक नारों या कुछ दिनों के दिखावे के आधार पर मतदान करने के बजाय उम्मीदवार के काम, व्यवहार, ईमानदारी और जवाबदेही को प्राथमिकता देनी चाहिए। सवाल पूछना विरोध नहीं, लोकतांत्रिक अधिकार है। विकास कार्यों का हिसाब माँगना अपमान नहीं, जनप्रतिनिधि के दायित्व की याद दिलाना है। चुनाव के बाद भी जनता को जागरूक रहना चाहिए और अपने प्रतिनिधि से पूछना चाहिए कि जो वादे किए गए थे, उनका क्या हुआ? नेताओं को भी याद रखना चाहिए कि चुनाव जीतना जनता का विश्वास हासिल करने की शुरुआत है, सेवा से मुक्ति का प्रमाणपत्र नहीं। जनता की समस्याएँ पाँच साल तक इंतजार नहीं कर सकतीं। जनप्रतिनिधि का असली मूल्यांकन विजय जुलूस से नहीं, बल्कि उसके कार्यकाल में किए गए कामों से होता है। लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है, जब नेता जनता के सामने जवाबदेह हों और जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग रहे। चुनाव से पहले चरणों में झुकना और जीतने के बाद जनता को झुकाना जनसेवा नहीं, राजनीतिक अवसरवाद है। कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति जनता से बड़ा नहीं हो जाता। उसे बड़ा बनाती है उसकी जिम्मेदारी, उसका चरित्र और उसके काम। जनता वोटर नहीं, लोकतंत्र की असली ताकत है। नेता जनसेवक है, शासक नहीं। कुर्सी सेवा का माध्यम है, अहंकार का सिंहासन नहीं। अगली बार जब कोई नेता आपके दरवाजे पर हाथ जोड़कर आए, तो केवल उसके वादे मत सुनिए, उसके पिछले काम भी याद रखिए। क्योंकि लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं है कि नेता चुनाव कैसे जीता, बल्कि यह है कि जीतने के बाद उसने जनता के लिए क्या किया। कुर्सी सेवा का साधन हो, सत्ता का अभिमान नहीं, जनता मालिक है लोकतंत्र की, नेता कोई भगवान नहीं!
जे पी शर्मा। जर्नलिस्ट




