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तर्क़ और संवेदना -डॉ दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

 

तर्क़ और संवेदना
मनुष्य के दो विपरीत परंतु पूरक छोर हैं। मस्तिष्क के भीतर जलती तर्क़ की ठंडी मोमबत्ती केवल दृश्यमान और गणितीय सत्य (1 + 1 = 2) को देखती है; यह नफा़-नुकसान और सुरक्षा की फाइलें खोलतीं हैं।
इसके विपरीत, हृदय की संवेदनाएं अदृश्य शून्यता, यादों और दर्द को महसूस करतीं हैं, जिसे तर्क़ ‘समय की बर्बादी’ मानता है।
जीवन के चौराहे पर तर्क़ का निर्णय सुरक्षित लेकिन बेजान होता है, जबकि भावनाएं अनिश्चितता के बावजूद सुकून देतीं हैं। तर्क़ के बिना मनुष्य आत्मघाती हो सकता है और संवेदना के बिना हाड़-मांस का रोबोट।
सच्ची परिपक्वता इन दोनों के संतुलन में है। तर्क़ यदि एक स्थिर किनारा है, तो भावना बहती हुई नदी है। एक ख़ूबसूरत और संतुलित जीवन के लिए मस्तिष्क को हृदय से मशविरा करना चाहिए और हृदय को मस्तिष्क की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।

-डॉ दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।

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