चढ़ावा– माया शर्मा

मैने आज बेशक मन्दिर जाकर पूजा की घण्टी बजाई प्रसाद चढ़ाया माला भी चढाई लेकिन रुपए नहीं चढ़ाये। मैने मन्दिर में चढ़ाने की बजाय वो पैसे garden में काम करने वाले मजदूरों को दिये । गाय को चारा खिलाया। कुत्तों को ब्रेड और बिस्किट दिये। पक्षियों के लिए दाने और पानी की व्यवस्था की। मेरे हिसाब से यही सच्ची सेवा है। किसी मन्दिर में चढ़ावा चढ़ाने से अच्छा है किसी जरूरत मन्द की मदद करना, किसी भूखे को निवाला देना।
मैं किसी मन्दिर में मटका दान नहीं करती बल्कि अपनी छत पर रखे मिट्टी के पात्र में रोजाना पानी भरकर रखती हूँ ताकि कोई पक्षी प्यासा ना रहे। रोटी का चूरा करके छत पर डालती हूँ ताकि पक्षियों का पेट भर सकूँ। मुझे दिखावे से ज्यादा अच्छा लगता है किसी की दिल से श्रद्धा अनुसात सेवा की जाए यही सच्ची पूजा होती है, दिखावे से दुनिया खुश होती है और श्रद्धा से भगवान।
*माया शर्मा*




