कृष्ण को खोजती हुई एक रात — डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ लेखिका एवं कवयित्री बैतूल, मध्यप्रदेश

कभी-कभी जिसे हम बाहर खोजते हैं, वह हमारे भीतर किसी मौन की तरह जन्म ले रहा होता है
शहर उस रात कुछ अलग था।
सड़कें रोशनी से भरी थीं। मंदिरों के बाहर फूलों की झालरें थीं। दुकानों पर छोटे-छोटे मोरपंख और बाँसुरियाँ टंगी थीं। हर तरफ कान्हा के जन्म की तैयारियाँ थीं।
रात जैसे कृष्ण के इंतज़ार में जाग रही थी।
मैं भी जाग रही थी।
लेकिन मेरा इंतज़ार किसी झाँकी के सामने खड़े होने का नहीं था।
मैं कृष्ण को खोज रही थी।
पता नहीं क्यों।
शायद इसलिए कि जीवन के कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर किताबों में नहीं मिलता। वे प्रश्न किसी शांत रात में अचानक हमारे सामने आ खड़े होते हैं और तब हम किसी ऐसे हाथ की तलाश करते हैं जो हमारे कंधे पर रखकर कह सके—
“घबराओ मत, मैं हूँ।”
उस रात मुझे उसी ‘मैं हूँ’ की तलाश थी।
मंदिर तक जाती हुई सड़क
मैं घर से निकली तो रात काफी हो चुकी थी।
शहर की चमक के बीच भी कुछ चेहरे उदास थे। किसी दुकान के बाहर एक बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़े खड़ा था। एक बुजुर्ग मंदिर की सीढ़ियों के किनारे चुपचाप बैठे थे। कुछ लोग जल्दी में थे, कुछ उत्सव में, कुछ अपने ही विचारों में खोए हुए।
मैंने सोचा—
क्या कृष्ण इन सबके बीच कहीं हैं?
फिर मन ने उत्तर दिया—
शायद।
कृष्ण को केवल वहाँ क्यों खोजें जहाँ उनकी मूर्ति रखी है?
क्या वह बच्चा, जो अपनी माँ की उँगली थामे हुए है, कृष्ण की किसी बाल-छवि से कम है?
क्या उस माँ की आँखों में अपने बच्चे के लिए जो चिंता है, उसमें यशोदा की कोई छाया नहीं?
क्या उस बुजुर्ग का मौन किसी ऐसी प्रार्थना जैसा नहीं, जिसमें शब्दों की आवश्यकता नहीं?
मैं चलते-चलते मंदिर तक पहुँच गई।
वहाँ कृष्ण थे, लेकिन मैं उन्हें देख नहीं पा रही थी
मंदिर में भीड़ थी।
घंटियाँ बज रही थीं। भजन हो रहे थे। लोग झूम रहे थे। फूल चढ़ाए जा रहे थे। पुजारी कृष्ण के जन्म की तैयारी कर रहे थे।
सामने सुंदर-सी मूर्ति थी।
मोरपंख।
मुस्कान।
पीताम्बर।
हाथ में बाँसुरी।
मैंने हाथ जोड़ दिए।
लेकिन मन शांत नहीं हुआ।
मैंने आँखें बंद कीं।
और अचानक राधा याद आईं।
न जाने क्यों।
शायद इसलिए कि कृष्ण को समझने के लिए कभी-कभी राधा के मौन से होकर गुजरना पड़ता है।
राधा की तरह प्रतीक्षा
कृष्ण की कथा में राधा का होना मुझे हमेशा एक प्रश्न देता है।
कृष्ण चले गए।
राधा रह गईं।
फिर भी प्रेम बचा रहा।
आज के समय में किसी के चले जाने का अर्थ अक्सर संबंध का समाप्त हो जाना माना जाता है। हम अनुपस्थिति को स्वीकार नहीं कर पाते। हमें उत्तर चाहिए। संदेश चाहिए। कारण चाहिए। साथ चाहिए।
लेकिन राधा ने शायद प्रेम को एक दूसरा अर्थ दिया।
उन्होंने कृष्ण को बाँधने की कोशिश नहीं की।
उन्होंने उनके लौटने की शर्त नहीं रखी।
उन्होंने अपने भीतर से कृष्ण को जाने नहीं दिया।
शायद प्रतीक्षा का सबसे सुंदर रूप यही है—
किसी के लौटने की उम्मीद में जीवन को रोक देना नहीं, बल्कि उसकी स्मृति को अपने भीतर सम्मान से जीवित रखना।
उस रात मुझे लगा, हम सबके भीतर कहीं न कहीं एक राधा है।
कोई व्यक्ति नहीं तो कोई सपना।
कोई सपना नहीं तो कोई अधूरा उत्तर।
कोई उत्तर नहीं तो शायद स्वयं से मिलने की प्रतीक्षा।
कृष्ण और शहर का अकेलापन
मंदिर से बाहर निकली तो शहर कुछ शांत हो चुका था।
रात गहरी हो रही थी।
सड़क किनारे कुछ दुकानें बंद हो रही थीं। रोशनी अब भी थी, लेकिन उत्सव की आवाज़ कम हो गई थी।
मैंने सोचा—
आज का मनुष्य कृष्ण को सबसे अधिक कहाँ खोजता होगा?
शायद अपने अकेलेपन में।
हम सबके पास मोबाइल हैं, संपर्कों की लंबी सूची है, संदेश भेजने के अनेक साधन हैं।
फिर भी कितनी बार ऐसा होता है कि मन किसी एक व्यक्ति से बात करना चाहता है और उसके पास कहने के लिए कोई नहीं होता।
कितनी बार हम भीड़ में खड़े होकर भीतर से अकेले होते हैं।
कितनी बार हमें केवल इतना सुनना होता है—
“तुम ठीक हो?”
और कोई यह पूछने वाला नहीं होता।
शायद ऐसे ही क्षणों में कृष्ण हमारे भीतर जन्म लेते हैं।
किसी चमत्कार की तरह नहीं।
बल्कि एक छोटी-सी आशा की तरह।
बाँसुरी का अर्थ
रास्ते में एक छोटी-सी दुकान पर बाँसुरियाँ अब भी टंगी थीं।
मैं कुछ देर वहीं रुक गई।
कृष्ण की बाँसुरी का आकर्षण केवल उसकी धुन में नहीं है।
बाँसुरी भीतर से खाली होती है।
शायद इसीलिए वह संगीत बन पाती है।
हम अपने भीतर इतने भरे हुए हैं कि किसी और की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती।
अपनी बात कहनी है।
अपनी पीड़ा बतानी है।
अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी है।
अपनी शिकायत रखनी है।
लेकिन सुनना?
वह धीरे-धीरे हमारे जीवन से गायब हो रहा है।
कृष्ण की बाँसुरी शायद हमें यही सिखाती है—
थोड़ा खाली रहो।
ताकि किसी की पीड़ा उसमें उतर सके।
किसी की हँसी उसमें गूँज सके।
किसी का मौन उसमें सुना जा सके।
और शायद ईश्वर भी।
कुरुक्षेत्र हमारे भीतर है
कृष्ण को खोजते-खोजते मुझे लगा कि मैं उन्हें वृंदावन में ढूँढ़ रही थी, जबकि उनका एक बड़ा रूप तो कुरुक्षेत्र में खड़ा है।
वहाँ कोई बाँसुरी नहीं थी।
वहाँ प्रश्न थे।
दुविधा थी।
मोह था।
कर्तव्य था।
और एक ऐसा मन था जो निर्णय लेने से डर रहा था।
आज हमारा जीवन भी किसी न किसी कुरुक्षेत्र से कम नहीं।
हमारे निर्णय हमें अपनों से दूर कर सकते हैं।
सही रास्ता हमेशा आसान नहीं होता।
कभी-कभी अपने ही लोग हमारे निर्णयों को नहीं समझते।
कभी हमें अपनी खुशी और अपने कर्तव्य के बीच खड़ा होना पड़ता है।
कभी किसी संबंध को बचाने और स्वयं को बचाने के बीच चुनाव करना पड़ता है।
ऐसे में कृष्ण शायद हमारे लिए निर्णय नहीं लेते।
वे केवल भीतर इतना प्रकाश करते हैं कि हम अपना रास्ता देख सकें।
यही उनकी सबसे बड़ी उपस्थिति है।
जन्माष्टमी की आधी रात
रात के बारह बज चुके थे।
कहीं दूर मंदिर से शंख की आवाज़ आई।
कृष्ण का जन्म हो चुका था।
लोगों ने जयकारे लगाए।
मैं भी कुछ देर वहीं खड़ी रही।
फिर मन में एक अजीब-सा प्रश्न आया—
कृष्ण का जन्म हर वर्ष क्यों होता है?
हम हर वर्ष वही कथा दोहराते हैं।
वही सजावट।
वही झाँकियाँ।
वही गीत।
वही पूजा।
शायद इसलिए कि कृष्ण को एक बार नहीं, हर युग में जन्म लेना पड़ता है।
जब अन्याय बढ़े—तो कृष्ण जन्म लें।
जब मनुष्य मनुष्य से दूर हो—तो कृष्ण जन्म लें।
जब रिश्तों में स्वार्थ प्रेम पर भारी पड़ने लगे—तो कृष्ण जन्म लें।
जब हम अपने कर्तव्य से भागने लगें—तो कृष्ण जन्म लें।
और जब हमारे भीतर उम्मीद समाप्त होने लगे—
तब भी कृष्ण जन्म लें।
लेकिन इस बार उनका जन्म किसी मंदिर में नहीं,
हमारे भीतर हो।
लौटते हुए
घर लौटते समय सड़क लगभग खाली थी।
आकाश में चाँद था।
शहर सोने लगा था।
मैंने पीछे मुड़कर मंदिर की ओर देखा।
रोशनी अब भी दिखाई दे रही थी।
लेकिन अब मुझे कृष्ण को वहाँ खोजने की इच्छा नहीं थी।
मुझे लगा—
कृष्ण शायद उस माँ के पास हैं, जो आधी रात तक अपने बच्चे की प्रतीक्षा कर रही है।
उस पिता के पास हैं, जो अपनी थकान छिपाकर परिवार के लिए मुस्कुरा रहा है।
उस लड़की के पास हैं, जो अपने टूटे हुए सपने को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
उस आदमी के पास हैं, जो अकेला है लेकिन फिर भी किसी और के लिए मजबूत बना हुआ है।
उस स्त्री के पास हैं, जो बहुत कुछ सहकर भी अपने भीतर प्रेम बचाए हुए है।
और उस व्यक्ति के पास भी—
जो किसी के लौटने की प्रतीक्षा में है,
लेकिन प्रतीक्षा को अपनी कमजोरी नहीं बनने देता।
शायद वहाँ कृष्ण हैं।
फिर समझ आया—कृष्ण को खोजने की जरूरत ही क्या थी?
घर के दरवाजे पर पहुँचकर मैंने एक बार फिर आकाश की ओर देखा।
रात समाप्त होने को थी।
पूर्व दिशा हल्की होने लगी थी।
तभी लगा—
मैं पूरी रात कृष्ण को खोजती रही,
जबकि कृष्ण कहीं गए ही नहीं थे।
वे मेरे प्रश्न में थे।
मेरी बेचैनी में थे।
मेरी प्रतीक्षा में थे।
मेरी करुणा में थे।
मेरे उस छोटे-से साहस में थे, जिसने मुझे अंधेरे के बावजूद बाहर निकलने दिया था।
शायद ईश्वर का होना हमेशा किसी चमत्कार की तरह दिखाई नहीं देता।
कभी वह केवल इतना होता है कि टूटने के बाद भी हम किसी को चोट पहुँचाने से बच जाते हैं।
कभी वह किसी अनजान व्यक्ति की मदद करने की इच्छा में होता है।
कभी किसी को क्षमा कर देने में।
कभी अपने हिस्से का कर्तव्य चुपचाप निभा देने में।
और कभी—
किसी के न लौटने पर भी प्रेम को अपने भीतर मरने न देने में।
उस रात कृष्ण को खोजती हुई मैं घर लौटी थी।
लेकिन सच यह था—
कृष्ण बाहर नहीं मिले।
वे मेरे भीतर एक बहुत धीमी बाँसुरी की तरह बज रहे थे।
और पहली बार समझ आया
कृष्ण को पाने के लिए- वृंदावन जाना आवश्यक नहीं।
कभी-कभी बस अपने भीतर इतना मौन चाहिए,
कि बाँसुरी की वह धुन सुनाई दे सके
जो बहुत देर से
हमारे ही भीतर बज रही है।




