अपने अपने नरक – सीमा शुक्ला चांद

नरक क्या है नरक ? क्या ये कोई स्थान है या कोई ऐसी अनुभूति जो सुख के विपरीत है। गरूण पुराण में विभिन्न प्रकार के उदाहरण नर्क को समझाते हैं। कहा जाता है हर जीव अपने कर्मों के अनुसार नरक में अपने किए गए कर्म को भोगता है। दरअसल नरक कोई स्थान नहीं है ये बस हमारी अनुभूतियों की एक स्थिति है। हम मरने के पश्चात नहीं जीते जी ही अपने जीवन काल में ही इसे भोगते हैं। जो जीव जितना अधिक मोह में होगा वो उतना ही अधिक नरक को अनुभव कर पाएगा। उदाहरण के रूप में एक व्यसन में संलिप्त जीव को लिजिए।ये जीव व्यसन की मादकता में लीन हो हर प्रकार के मोह को त्याग देता है ना इसके पास देह ना व्यक्तिगत ना सामाजिक कोई भी मोह होता है यह बस एकमात्र अपने व्यसन पर क्रन्दित होता है इसलिए किसी गंदे स्थान पर पड़े रहते हुए भी यह स्वर्ग की अनुभूति करता है परन्तु ठीक उसी समय इसकी देह को नरक अनुभव होता है ।यह तो हुए व्यसन कर्ता के नर्क स्वर्ग परन्तु इसी पल इसके साथ जिनके रक्त सम्बन्ध हैं वो भी नरक को अनुभव करते हैं वो नरक की विभिन्न प्रताड़नाओं से गुजरते हैं।जैसे व्यसन कर्ता से उनका मोह उन्हे मानसिक और सामाजिक रूप में खौलते तेल में तलता है वे इसे ना तो पूर्ण रूपेण छोड़ सकते हैं ना अपना सकते हैं ये मानसिक प्रताड़ना जीव के जीवन से मोह की गहराई पर निर्भर करते हैं। जीवन जितने अधिक मोह में होगा वह उतना अधिक खोलते तेल में डूबते उबरते रहेगा। वह जीव जो आपको तलने आया है वो अपने कर्मों से स्वयं तो स्वर्ग की अनुभूति करता है तथा उन जीवों को जिन्हें उसे प्रताड़ित करना है वो उसे अपने कर्मों द्वारा नरक दिखला देता है।
व्यसन भी अनेकों प्रकार का होता है किसी को मादक द्रव्यों का व्यसन होता है तो किसी को अन्य प्रतिबंधित कार्यों का परन्तु व्यसन कर्ता से अधिक नरक व्यसन कर्ता के मोह पाश में पड़ा हुआ जीव अनुभव करता है।
कुछ नरक सात्विक कार्यों द्वारा भी आपके पास पहुंचते हैं इस धरा पर सबसे सात्विक कार्यों में से एक ईश्वर भक्ति है। आपको जानकर हैरानी होगी की वह जीव जो किसी भी साधना में संलिप्त हैं उसने अपने सारे मोहपाश भंग कर दिए हैं परंतु उसी जीव से जुड़े प्रत्येक प्राणी अपने अपने मोह के अनुसार नर्क भोगते हैं। कभी कभी ये नर्क मानसिक रूप से तो कभी कभी दैहिक रूप से अनुभव होता है। जैसे साधना रत जीव तो अपनी साधना के माध्यम से हर क्षण स्वर्ग अनुभव करता है परन्तु उससे जुड़ा हुआ जीव उसकी दैहिक स्थितियों के कारण गहरे दुख में होता है यह दुख उस जीव को ना तो पोषण प्राप्त करने देता है ना जागने सोने देता है और इस प्रकार सभी सुविधाओं के मध्य वह जीव नरक अनुभव करता है। कुछ क्षणों के लिए हुई मानसिक या दैहिक परेशानी गर्म तेल के मात्र छिटे जैसे हैं या उस चाबुक की तरह जिसके घाव कुछ समय बाद भर जाते हैं परन्तु प्रत्येक क्षण होती पीड़ा निरंतर गर्म तेल में पड़े रहने से उत्पन्न पीड़ा की तरह है। वो परिवार जो बहुत कमा रहा है तो उनका नर्क देह की पीड़ा है। सम्पन् व सक्षम समाज के पास एश्वर्य के सुख के सभी संसाधन उपलब्ध है परन्तु उनका उपयोग प्रतिबंधित हैं। जैसे एक संपन्न परिवार के घर में भोजन के लिए छप्पन भोग की व्यवस्था है पर वह अपनी देह की रूग्णता के कारण उन छप्पन भोगों के लिए नित्य प्रति पल तरसता है अर्थात नर्क भोगता है। आपको जानकर हैरानी होगी की गले से नीचे जाने के बाद इंसान किसी भी तरह के स्वाद का अनुभव नहीं करता फिर बस जिह्वा को मिलने वाले संतोष के लिए जीव जो मानसिक शारीरिक संघर्ष करता है यही नरक है। वो हर कष्ट जो आपकी देह आपका मन महसूस करता है वह सभी नरक है। प्रेम में पड़ा जीव प्रति पल अपने प्रेम के पास रहने के लिए जो कष्ट झेलता है वह भी नरक ही है।इस पूरे आलेख का सार बस यही है की यदि आप मोह में हो तो नरक भोगना पड़ेगा। और यदि मोह का त्याग होगा तो हर परिस्थिति बस स्वर्ग का प्रतीक बन जाएगी क्रमशः
सीमा शुक्ला चांद




