बाबू शोना का खुमार, सच में है प्यार — डॉ. अनामिका दूबे “निधि”

आज का दौर सोशल मीडिया, इंस्टेंट मैसेज और इमोजी की दुनिया का दौर है। रिश्तों की शुरुआत अब अक्सर एक “हाय”, एक “फॉलो”, एक “लाइक” या एक “हार्ट” से होती है। कुछ ही दिनों में नाम बदल जाते हैं
“जान”, “बेबी”, “स्वीटू”, “बाबू”, “शोना”। लेकिन एक प्रश्न मन में बार-बार उठता है—क्या “बाबू शोना” कहना ही प्यार है? या यह केवल कुछ दिनों का खुमार है?
प्यार शब्द जितना छोटा है, उसका अर्थ उतना ही विशाल है। प्यार केवल मीठे संबोधनों का नाम नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान, त्याग, धैर्य और जिम्मेदारी का दूसरा नाम है। यदि रिश्ते की नींव केवल आकर्षण और दिखावे पर रखी गई हो, तो वह पहली ही आंधी में बिखर जाती है।
आज बहुत से युवा प्रेम को “स्टेटस”, “रिलेशनशिप अपडेट” और “रील्स” तक सीमित समझने लगे हैं। सुबह से रात तक “आई लव यू”, “मिस यू”, “बाबू खाना खाया?” जैसे संदेशों की भरमार रहती है। लेकिन जब मुश्किल समय आता है, जिम्मेदारियाँ सामने आती हैं या समझौते की आवश्यकता होती है, तब वही रिश्ता टूटने लगता है। तब समझ आता है कि यह प्यार नहीं, केवल भावनाओं का क्षणिक खुमार था।
सच्चा प्रेम कभी शोर नहीं करता। उसे दुनिया को दिखाने की आवश्यकता नहीं होती। वह व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देता है। वह सम्मान देना सिखाता है, एक-दूसरे के सपनों को सहारा देता है, कठिन परिस्थितियों में साथ निभाता है और बिना किसी स्वार्थ के अपनेपन का एहसास कराता है।
“बाबू शोना” जैसे संबोधन गलत नहीं हैं। हर रिश्ते की अपनी भाषा होती है। समस्या तब पैदा होती है जब इन शब्दों को ही प्रेम का प्रमाण मान लिया जाता है। यदि संबोधन मीठे हों, लेकिन व्यवहार में झूठ, स्वार्थ, नियंत्रण, अपमान और असम्मान हो, तो ऐसे शब्द केवल दिखावा बनकर रह जाते हैं।
प्रेम किसी को बदलने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे स्वीकार करना सिखाता है। वह अधिकार से अधिक विश्वास देता है। वह संदेह नहीं, सुरक्षा का एहसास कराता है। वह बंधन नहीं, स्वतंत्रता में भी अपनापन ढूँढ़ लेता है। सच्चा प्रेम समय के साथ और गहरा होता है, जबकि केवल आकर्षण समय के साथ फीका पड़ जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा प्रेम और आकर्षण के अंतर को समझें। किसी को “बाबू” या “शोना” कह देना आसान है, लेकिन जीवन की हर परिस्थिति में उसका साथ निभाना कठिन है। रिश्ते शब्दों से नहीं, कर्मों से मजबूत होते हैं। मीठी बातें कुछ समय के लिए मन मोह सकती हैं, लेकिन सच्चे प्रेम की पहचान कठिन समय में निभाए गए साथ से होती है।
अंततः प्रश्न वही है—”बाबू शोना का खुमार, सच में है प्यार?”
उत्तर यही है कि यदि इन शब्दों के पीछे विश्वास, सम्मान, समर्पण, धैर्य और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प है, तो यह सचमुच प्यार है। लेकिन यदि यह केवल आकर्षण, समय बिताने का साधन या दिखावे का माध्यम है, तो यह प्यार नहीं, कुछ दिनों का खुमार है, जो समय के साथ स्वयं उतर जाता है।
— डॉ. अनामिका दूबे “निधि”




