सम्मानों की मंडी। शिखा खुराना

जितनी तेज़ी से साहित्यकारों की संख्या बढ़ रही है, उससे कहीं अधिक रफ़्तार से “सम्मान उद्योग” फल-फूल रहा है। अब साहित्य लिखना जितना आसान नहीं, उससे कहीं आसान साहित्यकार कहलाना हो गया है, बस किसी संस्था की सूची में नाम होना चाहिए और जेब में सहयोग राशि।
आजकल सम्मान भी मौसम की तरह आने लगे हैं। बसंत आया तो बसंत श्री, वर्षा आई तो मेघ रत्न, स्वतंत्रता दिवस आया तो राष्ट्र गौरव, दीपावली आई तो दीप सम्मान। लगता है कैलेंडर के हर पन्ने के साथ एक नया सम्मान जन्म लेता है। यदि कोई विशेष अवसर न भी मिले तो “अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव”, “विश्व हिंदी रत्न” या “कलम विभूषण” जैसे नाम हमेशा तैयार रहते हैं। नाम जितना लंबा, सम्मान उतना बड़ा, कम-से-कम पोस्टर पर तो यही दिखाई देता है।
पहले साहित्यकार रचना छपने की प्रतीक्षा करता था, अब सम्मान-पत्र छपने की। पहले लोग पूछते थे, “क्या लिखा?” अब पूछते हैं, “इस महीने कितने सम्मान मिले?” और उत्तर भी बड़े आत्मविश्वास से आता है, “अभी तो पाँच ही मिले हैं, दो ऑनलाइन हैं और एक कुरियर से आने वाला है।”
सम्मान देने वाले भी कम चतुर नहीं। वे जानते हैं कि हर साहित्यकार के मन में प्रशंसा पाने की स्वाभाविक इच्छा होती है। बस उसी भावना को लक्ष्य बनाकर संदेश भेजा जाता है, “बधाई हो! देशभर से प्राप्त हजारों प्रविष्टियों में से आपका चयन प्रतिष्ठित सम्मान हेतु हुआ है। कृपया केवल सहयोग राशि जमा कर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करें।” चयन कब हुआ, किसने किया, कितनी रचनाएँ पढ़ी गईं, यह प्रश्न पूछना असभ्यता माना जाता है।
कुछ संस्थाओं ने तो पूरी व्यवस्था विकसित कर ली है। अलग-अलग शुल्क के अनुसार अलग-अलग पैकेज उपलब्ध हैं। साधारण सहयोग राशि पर ई-प्रमाणपत्र, थोड़ा अधिक दें तो मोमेंटो, उससे अधिक दें तो शॉल और श्रीफल, और यदि जेब कुछ ज़्यादा गर्म हो तो मंच पर मुख्य अतिथि के साथ फोटो




