संस्कार विहीन पुरुष बिना सींग और पूँछ के पशु समान है — श्री श्री 1008 श्री संत विष्णु दास जी नागा

जयपुर। पत्रकार जे.पी. शर्मा से विशेष वार्ता में संत विष्णु दास जी नागा ने कहा कि संस्कार विहीन पुरुष बिना सींग और पूँछ के पशु समान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कथन किसी व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य का स्मरण कराता है। मनुष्य और पशु दोनों में भोजन, निद्रा, भय और प्रजनन जैसी मूल प्रवृत्तियाँ समान होती हैं, किंतु मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं उसके संस्कार, विवेक, धर्म और आत्मसंयम। संत विष्णु दास नागा ने कहा कि भारतीय संस्कृति का संपूर्ण आधार ही संस्कारों पर टिका है। गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक वर्णित षोडश संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास की वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था हैं। जब व्यक्ति इन मूल्यों को आत्मसात करता है, तभी उसका जीवन समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनता है। उन्होंने हितोपदेश का प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत करते हुए कहा आहारनिद्राभयमैथुनं च समानमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभि समाना।अर्थात् भोजन, निद्रा, भय और मैथुन तो मनुष्य और पशु दोनों में समान हैं, किंतु धर्म ही मनुष्य की विशेषता है। धर्म से रहित मनुष्य पशु के समान हो जाता है। संत ने कहा कि यहाँ धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष से नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, न्याय, कर्तव्य, संयम और सदाचार से है।
उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य को अपने स्वभाव को ऊँचा उठाने का संदेश दिया है। गीता का उपदेश है कि मनुष्य अपने विवेक, आत्मसंयम और निष्काम कर्म से जीवन को सार्थक बनाए। जब जीवन से सद्गुण समाप्त हो जाते हैं, तब व्यक्ति का पतन आरंभ हो जाता है। संत विष्णु दास नागा ने कहा कि रामायण में भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने हर परिस्थिति में सत्य, वचनपालन, करुणा और धर्म का पालन किया। वहीं महाभारत यह शिक्षा देता है कि जब अहंकार, लोभ और अधर्म बढ़ते हैं, तो परिवार, समाज और राष्ट्र तक विनाश की ओर बढ़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि आज विज्ञान और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु यदि इनका उपयोग संस्कारों और नैतिक मूल्यों के बिना होगा, तो यही प्रगति विनाश का कारण भी बन सकती है। इसलिए आधुनिक शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण, परिवार के संस्कार, गुरु का मार्गदर्शन और भारतीय संस्कृति का ज्ञान भी आवश्यक है। युवाओं का आह्वान करते हुए संत विष्णु दास नागा ने कहा कि वे माता-पिता का सम्मान करें, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा रखें, सत्य बोलें, सेवा और परोपकार को जीवन का हिस्सा बनाएँ तथा अपने आचरण से समाज के लिए प्रेरणा बनें। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का भविष्य केवल डिग्रियों से नहीं, बल्कि संस्कारवान नागरिकों से सुरक्षित होता है। अंत में उन्होंने कहा कि मनुष्य की पहचान उसके वस्त्र, धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और संस्कारों से होती है। जिस समाज में संस्कार जीवित रहते हैं, वहाँ परिवार मजबूत होते हैं, संस्कृति सुरक्षित रहती है और राष्ट्र उन्नति करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का पहला कर्तव्य है कि वह स्वयं संस्कारवान बने और आने वाली पीढ़ी को भी भारतीय संस्कृति के अमूल्य संस्कार प्रदान करे।




