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कौन किसकी आकांक्षा पूरी कर सकता है – अलका गर्ग” अक्श “

 

मां सोच रही है, बेटा बड़ा होगा तो जो जो महत्वाकांक्षाएं अधूरी रह गई हैं, वह पूरी करेगा।
—बेटा अपनी इच्छायें लेकर संसार में आया है, तुम्हारी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने नहीं आया है।

—बाप सोचता है कि मैं नहीं हो पाया बहुत बड़ा अमीर, मेरा बेटा करके दिखा देगा। लेकिन बेटा संगीतज्ञ बनने की धुन पर अड़ा है। बेटे को धन में कोई रस नहीं है, वह कहता है संगीतज्ञ बनना है। बेटा अपनी वासनाएं लेकर आया है।

—और बाप ने बेटे को जन्म से पहले पूछा भी नहीं कि तू मेरी महत्वाकांक्षा पूरी कर सकेगा, जो मैं तुझे दुनिया में लाऊं।
—और बेटे ने भी न पूछा कि मैं अपनी महत्वाकांक्षा, वासना लेकर आता हूं, तुम सहारा बन सकोगे, मैं आऊं ?

—दोनों अपनी आकांक्षाएं लिए हैं। दोनों की महत्वाकांक्षाएं टकराएंगी, क्योंकि इस संसार कोई किसी की महत्वाकांक्षा पूर्ण करने आया ही नहीं, सबकी अपनी महत्वाकांक्षा हैं…
—अपने कर्मों का जाल है।। हर आदमी खुद होने को पैदा हुआ है। इसलिए तुम्हारी जरा भी महत्वाकांक्षा हैं किसी आदमी से तो वही जहर बन जाएगी।
—बाप देख रहा है बेटा तो धोखा दे रहा है। मैं चाहता हूं कि धनपति बन जाऊं, मैंने जिदंगी इसके लिए गंवाई इसी आशा में कि मरते वक्त मेरी आशापूरी होगी, और ये सितार बजा रहा है। अमीर होना तो दूर भिखमंगे हो जाएंगे, बुढ़ापे में पेट भर रोटी भी मिलेगी।

—मां सोचती है बेटा बड़ा हो जाएगा, एक साम्राज्य कल्पनाओं का उसने बना रखा है जो वह पूरा करेगा। जो उसका पति न कर पाया पूरी वह बेटा कर देगा। लेकिन बेटे को कोई और औरत मिल जाएगी, वह उसकी आकाक्षाएं पूरी करेगा कि मां की करेगा ?

—कौन किसकी आकांक्षाएं पूरी कर सकता है ? अपनी ही पूरी नहीं होती, दूसरे के पूरे होने का तो कोई उपाय नहीं।
—क्या तुमने किसी की —अपने माँ बाप की आकांशाएँ पूरी कीं जो अब अपनी संतान की तरफ़ टकटकी लगाए देख रहे हो।
—सबका अपना वजूद, सबकी अपनी आकांक्षाएँ..
कोई किसी की आकांक्षाएँ पूरी नहीं कर सकता है इसलिए ख़ुद ही कमर कस कर तैयार रहना होगा।

अलका गर्ग” अक्श “

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