मेवाड़ की माटी में हिंदी की महक – डॉ निर्मला शर्मा सहायक आचार्य, विद्या भवन रूरल इंस्टीट्यूट, उदयपुर ।
मेवाड़ की धरती वीर सपूतों और वीरांगनाओं की धरती रही है। यहाँ की मिट्टी ही नहीं संस्कृति और साहित्य भी बहुत समृद्ध रहा है। एक तरह से देखा जाए तो मेवाड़ धरा वीरता, संस्कृति और साहित्य की त्रिवेणी है। यहाँ के वीरों ने तलवार से इतिहास लिखा तो कवियों ने शब्दों एवं भाषा के द्वारा उस इतिहास को पीढ़ियों तक पहुँचाया। भाषा की उत्पत्ति मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही हुई है, भले ही प्रारंभ में उसका रूप मौखिक ही रहा। धीरे-धीरे मनुष्य के विकास के साथ भाषा भी विकसित होती गई। मेवाड़ी लोकभाषा भी समय के साथ-साथ विकसित हुई और धीरे-धीरे हिंदी के स्वर में स्वर मिलाकर प्रगति करने लगी। मेवाड़ी की आत्मीयता ने हिंदी और संस्कृत को अपना कर मेवाड़ की अभिव्यक्ति को व्यापक स्वर दिया। क्योंकि हिंदी की जननी संस्कृत है, इसलिए मेवाड़ी का हिंदी और संस्कृत दोनों से बराबर का नाता रहा है।
मेवाड़ के साहित्यिक परिवेश में अनेक बोलियों का प्रयोग चलन में रहा है। इस संदर्भ में मेवाड़ की भाषा पर एक बहुत प्रसिद्ध कहावत भी प्रचलित है कि ‘दस कोस पर पाणी बदले बीस कोस पर वाणी’ अर्थात मेवाड़ क्षेत्र में आठ, दस कोस पर बोली में बदलाव दिखाई देता है। शब्दों का परिवर्तित रूप सुनने को मिलता है। यहाँ की भाषा में डिंगल, पिंगल, मेवाड़ी और हिंदी का सुंदर अंतर्संबंध दिखाई देता है। मेवाड़ क्षेत्र में भाषा को विकसित करने में बहुत सारे कवियों और साहित्यकारों का योगदान रहा है । इनमें कुछ महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व रहे थे – कवि राजा श्यामलदास, महाराज चतर सिंह जी बावजी, दूरसा आढा इत्यादि । कवि राजा श्यामल दास मेवाड़ के इतिहासकार ही नहीं बहुत अच्छे कवि भी रहे हैं। इनके द्वारा रचित ‘वीर विनोद’ हिंदी और राजस्थानी का मिला-जुला रूप लिए हिंदी भाषा को समृद्ध बनाने में अग्रणी रहा है। मेवाड़ के संत और कवि महाराजा चतुर सिंह बहुत बड़े मनीषी थे। इन्होंने भगवद्गीता और पतंजलि के योगसूत्र का मेवाड़ी/हिंदी क्षेत्र के लिए सहज पदों व सरल भाषा में अनुवाद किया, जिससे आध्यात्मिक साहित्य का विकास हुआ जिससे मेवाड़ी के साथ-साथ हिंदी भाषा को समृद्धि मिली।
इसी परंपरा में एक और नाम आता है – पंडित नरेंद्र मिश्र का । ये मेवाड़ राजवंश के राज्य कवि और प्रसिद्ध वीर रस के कवि रहे। इन्होंने रानी पद्मिनी के जौहर और गोरा-बादल की वीरता पर ओजस्वी हिंदी कविताओं की रचना की, जिससे आधुनिक हिंदी कविता में मेवाड़ का शौर्य प्रखर रूप से उभरा। इनके अतिरिक्त ऐसे भी कवि हुए हैं, जिनका संबंध भले ही मेवाड़ से न रहा हो, लेकिन उन्होंने अपनी कर्म भूमि मेवाड़ को चुना और यहाँ के प्रतापी शासको के शोर्य का वर्णन यहाँ की भाषा में किया। इसका प्रमुख उदाहरण है – कवि दूरसा आढा । उन्होंने महाराणा प्रताप की वीरता पर अपने ग्रंथों की रचना की। जिन्होंने आगे चलकर हिंदी को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
मेवाड़ में हिंदी भाषा का प्रचार और प्रसार भक्ति काल में बहुत अधिक हुआ, जब मेवाड़ की धरा पर भक्ति मति मीरा का आगमन हुआ। भक्तिकाल में मीरां बाई ने अपनी भक्ति और पदों (कृष्ण भक्ति के पद) के माध्यम से मेवाड़ की मिट्टी की अनुभूति को देश-देशांतर तक पहुँचाया। उनके शब्दों में लोक जीवन की सहजता भी है और हिंदी की ऐसी भाव-संपदा भी, जिसने उन्हें जन-जन की कवयित्री बना दिया। मीरां के पदों से मेवाड़ी, राजस्थानी के साथ-साथ हिंदी को भी व्यापकता मिली। मीराबाई के अतिरिक्त संत रैदास मेरा अपने गुरु मानती थी, ने भी राजस्थानी के माध्यम से हिंदी को मजबूती प्रदान की। हालांकि संत रैदास का संबंध काशी से था किंतु मेवाड़ की धरा से उपजे शब्दों ने संपूर्ण भारत में भाषा की एक अलग पहचान बनाई।
कवि और कवयित्रियों के साथ-साथ मेवाड़ में हिंदी को समृद्ध करने में राजा महाराजाओं से प्राप्त ताम्रपत्रों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ताम्रपत्र केवल इतिहास को ही अपने भीतर नहीं समेटे रहते, ये भाषा के संक्रमण के भी सजीव और अनूठे प्रमाण होते हैं। मेवाड़ क्षेत्र में ऐसे कई तांम्रपत्र हैं , जिनकी भाषा देवनागरी लिपि तथा प्राकृत और संस्कृत में भी उपलब्ध हैं। मेवाड़ की हिंदी की एक विशेषता यह जान पड़ती है कि यहाँ के राजाओं ने धीरे-धीरे स्थानीय भाषाओं को भी अपनाया । स्थानीय भाषा में पुरानी पश्चिमी राजस्थानी और मेवाड़ी बोली के रूप में विकसित हुई, जो आगे चलकर परिष्कृत हिंदी बनकर हमारे सामने आई।
मेवाड़ के ताम्र पत्रों में प्रयुक्त शब्द जो मेवाड़ी बोली से आते हैं, प्रशासनिक शब्द के रूप में प्रयोग किए गए। जैसे – ‘पीवल’ (सिंचित भूमि), माल (गाँव से दूर की भूमि), मगरा (जहाँ पर फसल का उत्पादन कम हो), गोरमों (गाँव के बिल्कुल नजदीक चारों ओर की जमीन), चरनोट (जहाँ केवल पशुओं की चराई होती है)। इस तरह के लोक शब्दों का प्रशासनिक शब्दावली में प्रयोग किया जाना, इस बात का प्रमाण भी प्रस्तुत करता है कि किस तरह से मेवाड़ की लोक भाषा हिंदी का रूप लेते हुए सरकारी स्वरूप में बदल रही थी।
किसना आढ़ा ने रघुवरजस प्रकाश और भीम विलास तत्कालीन हिंदी ग़्रथ रचे। प्रयागदास जैसे कवि ने कपड़ कुतुहल जैसा दोहा काव्य ग्रन्थ लिखा। कवि थाना चौहान ने निर्गुण भक्ति पद लिखे, तो उनके पौत्र ने मोहनलाल के नाम से अनेकों हिंदी ग्रंथ रचे। महाराणा सज्जन सिंह ने हिंदी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र को उदयपुर बुलाकर कवि सम्मेलन की बुनियाद रखी तब मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या और नागरी प्रचारिणी सभा के लिए हिंदी ग्रंथों को संपादित करने में जुटे हुए थे। हिंदी में इतिहास लेखन की शुरुआत गौरी शंकर हीराचंद ओझा और राम रतनजी ने उदयपुर से ही की। इस तरह मेवाड़ की धारा पर हिंदी भाषा फलती फूलती गई।
पृथ्वीराज रासो का संपादन भी मेवाड़ की देन है जबकि महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) ने राजसमंद की पाल पर वरदाई के छंद गाने वालों का सम्मेलन आहूत किया। इस तरह हिंदी का रासो अथवा वीरगाथा काल सामने आया। बाद में इस रासो के संग्रह के लिए अन्यत्र भी सम्मेलन हुए और भाषा में रासो के संग्रह की प्रवृत्तियां सामने आईं। मेवाड़ में रायमल रासो, राणा रासो आदि कई रासो ग्रंथ, ढाल, थोकड़ा, गजल आदि भी लिखे गए।
महाराणा राजसिंह स्वयं कविताएँ लिखते थे। बेड़वास और कांकरोली के अभिलेखों में उनकी कविताओं के प्रमाण मिलते हैं।।रणछोड़ भट्ट अपने छोटे भाई लक्ष्मीनाथ के लिए कहता है कि वह महाराणा जयसिंह की सभा में लोकभाषा में सुभाषित और रचनाएं लिखकर सुनाता था। उदयपुर के एक अज्ञात हिंदी कवि भोपराम के छंद श्रीकृष्ण जुगनू ने दो शिलालेखों में खोज निकाले हैं। सालेरा और पुला के देवालयों अभिलेखों में पूरबाई धाय और उसके पति तथा पुत्र के निर्माण कार्यों की प्रशंसा में लिखे गए कवित्त छंद उत्कीर्ण हैं : अटल रहो सुभाग भाग ध्रु जु अटल रहो, पूरबाई पूरो पूज्यो बी पूजी गणगौर है।
मेवाड़ी भाषा में उपलब्ध अनेक कहावतें और मुहावरे हैं, जो धीरे-धीरे समय के साथ हिंदी में प्रयुक्त होने लगे हैं। ताम्र पत्रों को लेकर ही हमारे मेवाड़ में एक मुहावरा है, अगर कोई व्यक्ति अपनी बात पर अड़ा रहता है मानता नहीं है तो उसके लिए – “थारे नामें कई अणी चीज़ रो ताम्बा पत्तर लिख्यो है कई ? ” अर्थात् कोई चीज हमेशा के लिए तुम्हारे नाम लिख दी गई है क्या ?
ऐसी अनेक कहावते हैं जो मेवाड़ी या राजस्थानी से आती है और थोड़ी सी परिवर्तित होकर हिंदी का रूप ले लेती है और आज भी प्रचलन में है। जैसे – ‘भागता भूत रो लंगोट ही चोखो’, ‘थोथो चणो बाजे घणो’, ‘बांद्रो काई जाणे आदा रो स्वाद’ आदि। मेवाड़ी, राजस्थानी इन कहावतों और मुहावरों से हिंदी भाषा की मिठास और बढ़ जाती है।
आज भी मेवाड़ी भाषा के अनेक शब्द धापना, पाग, चूरमो, टाबर, छोरा -छोरी, बिंदणी, चौमासा, जुगाड़ आदि ऐसे शब्द है, जिनकी उत्पत्ति मेवाड़ की धरा पर हुई है, किंतु हिंदी भाषा में इनका प्रयोग धड़ल्ले से किया जाता है। कुछ शब्द तो प्रमाणिक तौर पर प्रयोग किए जाते हैं।
यहाँ की भाषा में मिट्टी की खुशबू है, जिसका एहसास समय-समय पर हिंदी हमें करवाती रहती है। धीरे-धीरे इसी मेवाड़ी हिंदी ने कविता, साहित्य और सामाजिक संवाद की सशक्त भाषा का रूप ग्रहण किया। यहाँ की रचनात्मक परंपरा ने हिंदी को स्थानीय संवेदना, लोकजीवन और ऐतिहासिक चेतना से समृद्ध किया।
मेवाड़ में हिंदी महज भाषा नहीं, लोक और इतिहास के बीच बना वह सेतु है, जिस पर चलकर मेवाड़ की स्मृतियाँ (परम्पराएँ, लोक जीवन, संगीत) आज भी शब्दों में जीवित हैं।
डॉ निर्मला शर्मा
सहायक आचार्य
विद्या भवन रूरल इंस्टीट्यूट, उदयपुर ।




