उसके बाद…डॉ इंदु भार्गव जयपुर

शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गाँव की पगडंडियों पर उतर रहा था। सूरज जाने से पहले अपनी आख़िरी किरणें पुराने पीपल के पेड़ पर छोड़ गया था। उसी पेड़ के नीचे मिट्टी की एक छोटी-सी चौकी थी, जिस पर हर दिन की तरह आज भी रामदीन बैठा था!
लेकिन आज उसके हाथ में चाय का गिलास नहीं था!
सामने वही टूटा हुआ रास्ता था, जिस पर कभी उसका बेटा मुकेश स्कूल से दौड़ता हुआ घर आया करता था!
बाबा! देखो, आज मास्टरजी ने मुझे पूरी कक्षा में सबसे ज्यादा नंबर दिए हैं!
रामदीन तब हँसते हुए उसकी पीठ थपथपाता था!
मेरा बेटा है ही होशियार!
मुकेश हँसकर कहता, मैं बड़ा होकर शहर जाऊँगा, बहुत बड़ा आदमी बनूँगा, फिर आपको भी अपने साथ शहर ले जाऊँगा!!
रामदीन हर बार एक ही बात कहता,
मुझे कहीं नहीं जाना बेटा, तू बस खुश रहना!!
समय बीतता गया!
मुकेश बड़ा हुआ! पढ़ाई के लिए शहर चला गया! फिर नौकरी लगी, उसके जीवन में धीरे-धीरे गाँव, मिट्टी और वह बूढ़ा पिता पीछे छूटते गए!!
शुरुआत में हर रविवार फोन आता था!!
बाबा, कैसे हो?
ठीक हूँ बेटा!!
दवाई लेते हो?
हाँ!!
खाना समय पर खाया?
हाँ रे, तू अपनी चिंता कर!
फिर फोन महीने में एक बार आने लगा!
फिर त्योहारों पर!
और फिर…
कभी-कभी!
रामदीन फिर भी हर शाम पीपल के नीचे बैठकर सड़क की ओर देखता रहता!
उसे विश्वास था कि एक दिन मुकेश अचानक सामने खड़ा होगा और कहेगा
बाबा, चलो… अब आपको अपने साथ ले जाने आया हूँ!
उस दिन गाँव में दीपावली थी!
हर घर में दीये जल रहे थे। बच्चे पटाखे चला रहे थे। और रामदीन ने अपने छोटे-से घर के दरवाजे पर एक दीया रख दिया था!
वह सुबह से ही खुश था!!
आज मुकेश आएगा!
पड़ोस की शांति ने पूछा, “किसने कहा?”
रामदीन मुस्कुराया!
किसी ने नहीं। बाप को बताने के लिए बेटे की आवाज़ की जरूरत थोड़े ही होती है!
शाम हुई!
रात हुई!
आधी रात बीत गई!
मुकेश नहीं आया!!
रामदीन ने दरवाजे पर रखा दीया बुझने नहीं दिया!
सुबह तक उसकी आँखें दरवाजे पर लगी रहीं!!
अगले दिन फोन आया!
मुकेश था।!
बाबा…
हाँ बेटा!
इस बार नहीं आ पाया। बहुत काम था!
रामदीन ने कुछ पल चुप रहकर पूछा
तू खुश है न?
मुकेश चौंका!
हाँ बाबा!!
बस… फिर ठीक है!!
उसने फोन रख दिया!
किसी शिकायत के बिना!
किसी उलाहने के बिना!
लेकिन उस दिन पहली बार रामदीन ने पीपल के नीचे बैठना छोड़ दिया!!
दिन बीतते गए!
एक सर्द सुबह रामदीन की तबीयत अचानक बिगड़ गई!
पड़ोसियों ने उसे अस्पताल पहुँचाया!
डॉक्टर ने कहा, “उम्र बहुत हो गई है। किसी अपने को बुला लीजिए!!
शांति ने मुकेश को फोन किया!!
बेटा, तुम्हारे बाबा की हालत ठीक नहीं है!
उधर कुछ क्षण खामोशी रही!
फिर मुकेश ने कहा
मैं कोशिश करता हूँ आने की!!
कोशिश नहीं बेटा… आ जाना!!
लेकिन मुकेश..
शहर से गाँव की दूरी सिर्फ 17 किलोमीटरों थी।
वह दूरी उन वर्षों की थी, जिनमें एक पिता अपने बेटे की प्रतीक्षा करता रहा था!
मुकेश अगले दिन पहुँचा!!
अस्पताल के कमरे में उसका बूढ़ा पिता आँखें बंद किए लेटा था!
बाबा…
रामदीन ने धीरे से आँखें खोलीं!
पहले कुछ क्षण उसे जैसे विश्वास ही नहीं हुआ!
फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई!
तू आ गया?
हाँ बाबा!
रामदीन ने अपना काँपता हुआ हाथ उठाया!!
मुकेश ने वह हाथ पकड़ लिया!
हाथ बहुत हल्का था!
बहुत ठंडा!
मुकेश की आँखों में आँसू आ गए!
बाबा, मैं आपको शहर ले जाऊँगा। अब अकेले नहीं रहोगे!
रामदीन ने उसकी ओर देखा!!
शहर में… मेरे लिए जगह है?
सबसे बड़ी जगह है बाबा!!
रामदीन मुस्कुराया!
फिर ठीक है!!
उस रात दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे!
रामदीन पुराने दिनों को याद करता रहा!
याद है, तू आम के पेड़ पर चढ़ गया था और नीचे उतरते वक्त गिर पड़ा था?
मुकेश हँसते-हँसते रो पड़ा!
आपने तब मुझे बहुत डाँटा था!
डाँटा नहीं था… डर गया था!
कुछ देर बाद कमरे में खामोशी छा गई!
रामदीन ने धीमे से पूछा
मुकेश …
जी बाबा!!
मैंने तुझे कभी रोका तो नहीं था न?
मुकेश ने सिर झुका लिया।
नहीं बाबा!!
फिर तू इतने साल मुझसे दूर क्यों रहा?
यह सवाल बहुत छोटा था!
लेकिन मुकेश के पास उसका कोई उत्तर नहीं था!
रामदीन ने उसका हाथ दबाया।
कोई बात नहीं!
फिर वह धीरे से बोला
माँ होती तो शायद तुझे डाँटती!
मुकेश की आँखों से आँसू बह निकले!
बाबा… मुझे माफ कर दो!!
रामदीन ने मुस्कुराकर कहा
बाप बच्चों को माफ नहीं करता बेटा… बाप तो बस इंतज़ार करता है!
उस रात रामदीन सो गया!!
मुकेश उनके पास बैठा रहा!
सुबह अस्पताल की खिड़की से धूप भीतर आई!
नर्स ने आकर चादर ठीक की।
रामदीन की आँखें बंद थीं!
मुकेश ने उनके कंधे को हिलाया!
बाबा…
कोई जवाब नहीं आया!
बाबा, उठो…
कमरे में सन्नाटा था।
मुकेश ने पिता का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया।
वह हाथ अब बिल्कुल स्थिर था।
उसकी सारी गर्मी जैसे किसी और दुनिया में चली गई थी।
मुकेश फूट-फूटकर रो पड़ा।
“बाबा… मैं आ गया था।”
लेकिन इस बार पिता ने आँखें नहीं खोलीं।
रामदीन की अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।
शांति दूर खड़ी रो रही थी।
पीपल का पेड़ बिल्कुल शांत था।
मुकेश ने पिता की चिता को मुखाग्नि दी।
लपटें उठीं तो उसे लगा जैसे उसके सामने उसकी पूरी जिंदगी जल रही हो।
उसने सोचा
काश, उसने एक बार फोन करने के बजाय दस बार फोन किया होता।
काश, उसने काम से एक दिन की छुट्टी लेकर पिता के पास बैठना चुना होता।
काश, दीपावली की उस रात वह शहर की रोशनी छोड़कर गाँव की उस छोटी-सी लौ के पास आ गया होता।
लेकिन समय कभी “काश” सुनकर वापस नहीं लौटता।
अंतिम संस्कार के बाद जब सब लोग चले गए, मुकेश अकेला घर में बैठा था।
उसे पिता की पुरानी संदूकची दिखाई दी।
उसने उसे खोला।
अंदर कुछ पुराने कपड़े थे।
एक टूटी हुई घड़ी।
मुकेश की बचपन की तस्वीर।
और एक छोटी-सी कॉपी।
मुकेश ने कॉपी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था
मुकेश के लिए
अगले पन्ने पर तारीखें थीं।
हर तारीख के नीचे सिर्फ एक-दो पंक्तियाँ।
“आज मुकेश का फोन आया। बहुत खुश हुआ।”
“आज मुकेश नहीं आया। शायद काम ज्यादा होगा।”
“आज उसकी आवाज़ कुछ थकी हुई लगी। भगवान उसे खुश रखे।”
“आज दीपावली है। दरवाजे पर दीया रखा है। शायद बेटा आए।”
और आखिरी पन्ने पर लिखा था
“आज मुकेश आया था। बहुत देर से आया, लेकिन आया। अब मन शांत है।”
उसके नीचे एक और वाक्य था
“अगर मैं कल न रहूँ, तो उसे यह मत कहना कि मैं उसका इंतज़ार करता रहा। उसे कहना कि मैं उससे बहुत खुश था।”
मुकेश कॉपी सीने से लगाकर रोता रहा।
उस दिन उसे पहली बार समझ आया कि पिता की सबसे बड़ी पीड़ा अकेलापन नहीं था।
पीड़ा यह थी कि उसने कभी अपने बेटे को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अकेला है।
कुछ महीने बाद मोहन ने शहर की नौकरी छोड़ दी।
लोगों ने पूछा
“इतनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़ी?”
वह सिर्फ मुस्कुराया।
वह गाँव लौट आया।
पुराने घर की मरम्मत करवाई।
पीपल के नीचे एक छोटी-सी बेंच बनवाई।
और गाँव के बच्चों के लिए शाम को पढ़ाने लगा।
एक दिन एक छोटा बच्चा उसके पास आया।
“मास्टरजी, मैं बड़ा होकर शहर जाऊँगा।”
मुकेश कुछ पल चुप रहा।
फिर मुस्कुराकर बोल
“ज़रूर जाना। खूब बड़ा आदमी बनना।”
बच्चे ने पूछा
“फिर वापस आना पड़ेगा?”
मुकेश ने उसकी आँखों में देखा।
उसकी आँखों के सामने पिता का चेहरा तैर गया।
उसने बच्चे के सिर पर हाथ रखा।
“हाँ बेटा… वापस आना।”
शाम को सूरज ढलने लगा।
पीपल की पत्तियाँ हवा में सरसराईं।
मुकेश उसी बेंच पर बैठ गया, जहाँ कभी रामदीन बैठा करता था।
उसने आँखें बंद कीं।
उसे लगा जैसे कोई बहुत धीमी आवाज़ में कह रहा हो
“तू आ गया बेटा?”
मुकेश की आँखें भर आईं।
उसने आसमान की ओर देखा और कहा
“हाँ बाबा… अब कहीं नहीं जाऊँगा।”
उसके बाद…
गाँव की उस पगडंडी पर कोई पिता अपने बेटे की प्रतीक्षा नहीं करता था।
क्योंकि मुकेश ने तय कर लिया था कि किसी और पिता को इंतज़ार की वह पीड़ा नहीं सहनी पड़ेगी!
और पीपल के नीचे रखी वह बेंच आज भी हर शाम बच्चों से घिरी रहती है!
शायद यही किसी पिता की सबसे बड़ी विरासत थी!!
उसका बेटा लौट आया था।
बस…
!! थोड़ा देर से!!
डॉ इंदु भार्गव जयपुर




