“यह कैसा न्याय”- विनोद कुमार शर्मा

नीति नियंता संविधान निर्माताओं के द्वारा बनाए संविधान में संशोधनों के अधिकार के उपयोग से बड़ी अपेक्षाएं होती हैं देश वासियों को सोचते हमारे जन प्रतिनिधि हमारी अपेक्षाओं उम्मीदों पर खरे उतरेंगे लेकिन क्या ऐसा वास्तविक हो रहा है
जब नियम कायदे कानून जन भावनाओं के अनुरूप न होकर वोट बैंक के अनुरूप बनाए जाने लगें तो देश में सामाजिक समरसता एकता अखंडता सौहार्द सामाजिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता कैसी विडंबना है कि इस देश में महिलाओं के दुष्कर्मों को भी जाति आधारित बना दिया गया यदि किसी आरक्षित वर्ग की महिला से दुष्कर्म तो त्वरित आर्थिक सहायता और किसी सवर्ण महिला के साथ हो तो आर्थिक सहायता के नाम पर कुछ नहीं संविधान निर्माताओं ने ऐसा भेदभाव पूर्ण संविधान तो नहीं बनाया था जिसमें सामाजिक न्याय की व्यवस्था को तार तार कर दिया जाए महिलाओं को जाति पांति के आधार पर उनसे भेदभाव किया जाए जिस देश में देशद्रोह आतंक के अपराध की पहले जांच फिर प्रथमसूचना रिपोर्ट फिर जेल और वेल लेकिन SCST ACT में पहले ही अपराधी मानकर जांच से पहले गिरफ्तारी और जमानत का प्रावधान नहीं एसे कानून क्या यह मूल अधिकारों का हनन नहीं करते!! एसे भेदभाव वाले कानूनों के दूरगामी परिणाम विद्वेष विभाजन और जातिगत नफरत को बढ़ावा नहीं दे रहे!
विनोद कुमार शर्मा




