शुभरात्रि – नरसा राम जांगु

आज की रात उस अनदेखी दोस्त के नाम – एक अधूरी आत्मा की कहानी
शुरुआती पंक्तियाँ –
मिले नहीं कभी, देखा भी नहीं,
फिर भी दिल में बसी हो कहीं।
शब्दों में जो प्यार पला था,
आज भी आँखों में सजा है वहीं।
गद्य रेखाचित्र (एक कल्पना) –
आज की रात उसी महिला मित्र के नाम, जिससे कभी मिला ही नहीं।
न कभी चेहरा देखा, न कभी हाथ थामा। बस सोशल मीडिया की एक छोटी सी दुनिया थी, जहाँ शब्द ही चेहरा थे, और विचार ही मुलाकात।
वो रिश्ता जिस्म का नहीं था, दो आत्माओं का था। ऐसा प्रेम जिसमें पाने की चाह नहीं, बस एक-दूसरे के लिए जीने-मरने का जज्बा था। दोनों के दिल में एक ही ख्याल – वो ठीक हो, वो खुश हो।
फिर एक दिन, बातों ही बातों में एक शब्द… एक छोटा सा, अनचाहा, भ्रमित सा शब्द लिख गया। न उसकी मंशा गलत थी, न मेरी। पर उस एक शब्द ने सारी उम्मीदों, सारे वादों को शीशे की तरह चकनाचूर कर दिया।
जो नहीं होना था, वो हो गया। और जो नहीं चाहते थे, वो पछतावा दोनों के हिस्से में आ गया।
आज भी, इस रात के सन्नाटे में, दोनों के मन में वही प्रेम वैसा ही जिंदा है। अधूरा, पर सच्चा। टूटा हुआ, पर पवित्र। दोनों जानते हैं, ये कभी पूरा नहीं होगा… और फिर भी दोनों को एक अटूट विश्वास है कि एक दिन, किसी मोड़ पर, वही प्रेम फिर उसी रूप में लौट आएगा।
शायद यही आत्मिक प्रेम की सबसे बड़ी सजा और सबसे बड़ा इनाम है।
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नोट : यह रचना पूर्णतः लेखक की कल्पना पर आधारित एक भावनात्मक गद्य रेखाचित्र है। इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, वास्तविक घटना या निजी संबंध से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति है, अतः इसकी किसी भी प्रकार की तथ्यात्मक, सामाजिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेखक की नहीं है।
स्वरचित लेखक :
नरसा राम जांगु




