“रोटी वाली अम्मा”- लेखक – नरसा राम जांगु

शहर के चौराहे पर वह हर दिन दिखती थी। उम्र यही कोई सत्तर के पार, झुकी हुई कमर, फटे आँचल में बंधी दो रोटियां और एक छोटी सी पानी की बोतल।
लोग उसे “रोटी वाली अम्मा” कहते थे।
मैं रोज़ ऑफिस जाते हुए उसे देखता। वह किसी से कुछ माँगती नहीं थी। बस एक पुराने पीपल के नीचे बैठी, आते-जाते रिक्शे वालों, मजदूरों को आवाज देती – “बेटा, भूख लगी हो तो एक रोटी ले लो।”
एक दिन मैंने जिज्ञासा में पूछ ही लिया – “अम्मा, तुम खुद भूखी बैठी हो, अपनी रोटी दूसरों को क्यों बाँट देती हो?”
वह मुस्कुराई। उसके झुर्रियों भरे चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी।
बोली, “बेटा, मेरा एक ही बेटा था। इसी शहर में मजदूरी करने आया था। एक दिन मालिक ने बिना रोटी दिए दिन भर काम कराया और मेरे बेटे ने भूख से तड़प कर दम तोड़ दिया। उस दिन मैंने कसम खाई, इस शहर में कोई भूखा नहीं सोएगा। मेरे बेटे को रोटी नहीं मिली, पर मैं किसी और के बेटे को भूखा नहीं मरने दूंगी।”
उस दिन मैं समझा, अम्मा रोटी नहीं बाँट रही थी, वह अपने बेटे के हिस्से का प्यार बाँट रही थी।
उसके फटे आँचल में दो रोटियां नहीं, पूरे समाज के लिए ममता बंधी थी।
वह अनपढ़ थी, पर उसने मुझे मानवता का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया था – कि इंसान होना ही सबसे बड़ा धर्म है।
लेखक – नरसा राम जांगु
संपादक
मेरा भारत महान – “हिंदी साहित्य लेखन मंच” राजस्थान




