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यात्राएं क्यों जरूरी है क्योंकि कभी-कभी हम घर में नहीं अपने आप में कैद हो जाते हैं – मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

 

आज मैं सफर पर थी।
सफर के दौरान अनेक चेहरों से हम परिचित होते हैं। उसमें कुछ अपने बन जाते हैं कुछ सफर तक का साथ निभाते हैं।
इस सफर के दौरान एक अनजान अधेड़ उम्र की स्त्री, डरी सहमी-सी उदास मन के साथ गहरी उधेड़बुन में थी।
वो सामने वाली सीट पर बैठी लगातार खिड़की के बाहर चल रहे दृश्यों को निहार रही थी। दृश्यों को निहारते हुए उसके मन के भाव हर बदल रहे थे। कभी चेहरे पर शिकन,कभी उदासी और कभी,आँखों में भरा गंगाजल लुढ़कने के लिए बेबस साफ दिखाई दे रहा था।
मैं साफ महसूस कर पा रही थी कि अतीत के तूफानों से लड़ते हुई उभरने की नाउम्मीद लिए बैठी है ।… मेरा मन हुआ उससे बात करूंँ।
मैं औपचारिक रूप में बोली कहांँ जाओगे आप?
उसने खुद को संभालते हुए जवाब दिया बिहार में मायका है मेरा,‌ वहीं जा रही हूंँ। उसने पूछने पर अपना नाम सोनम बताया।

बात शुरू की तो काफी देर तक इधर-उधर की बातें होती रही। फिर मैंने सकुचाते हुए प्रश्न किया, “आप कुछ परेशान लग रही है।” बस इतना भर कहते ही पता नहीं उसने मुझमें क्या देखा। अतीत की सारी परतें खोलती चली गई।
सुनकर उसकी व्यथा सजल होती आंँखों को मैंने छुपाते हुए दुपट्टे से पोंछ लिया।
मन किया उसे कलेजे से लगा लूँ ताकि उसे शीतलता मिले लेकिन मेरा मन ठिठक कर रुक गया और सांत्वना देता हुआ बोला…नहीं आज उसे कमजोर नहीं मजबूत बनाना है। खुलने दे सारी परतों को… मैंने उससे उसकी बचपन के बारे में पूछा वहांँ भी सारी प्रवृत्तियांँ बिगड़ी पड़ी थी हर पल अपनों से शोषण का शिकार तन मन कुंठित हुआ पड़ा था। इसलिये सारी दुनिया बेमानी नजर आती है। विश्वास बनता ही नहीं कहीं। डरा सहमा इंसान यही सोचता है, पता नहीं अगला शोषण करने वाला कहां घात लगाए बैठा हो।

मैंने उसे समझाया, “सोनम जो गुजर चुका है उसे बदला नहीं जा सकता आगे की सुधी ले। उसने कहा इतना आसान नहीं होता उन घावों को भरना जो नासूर बन चुके हैं।”
वे नदी के वेग से मन में बहते हैं और उनके साथ बहती है कुंठित होती यह जिंदगी…

क्या करूंँ आप बताओ, न मैं जी पा रही हूंँ,न मैं मार पा रही हूंँ। किसी पर मुझे विश्वास नहीं और जिंदगी से मोह नहीं बस बोझ लगती है।
मैंने कहा, “कुछ नहीं करना बस थोड़ा रुख बदल दो अपने विचारों का…”

जब तक इसे बोझ समझकर जीती रहोगी तब तक यह बोझ हल्का नहीं होगा । मैं सिर्फ इतना ही कहूंँगी अतीत की नकारात्मकता के साथ अपने आज को होम की आहुति मत बनने दो। अपने आप से जुड़ो आध्यात्मिक की राह चुनों…
खुद को जानों… अपनी चेतना को पहचानों।
जब खुद को जान पाओगी तो दुनिया को एक अलग नजरियां दे पाओगी ।
सोनम ने कहा, “यह इतना आसान नहीं है जितना आपको दिख रहा है। “आसान नहीं लेकिन नामुमकिन भी नहीं हम कर सकते हैं। गुरुजी कहते हैं दुनिया में जितने भी आविष्कार हुए हैं यह सब हमारे जैसे लोगों ने ही किए हैं । बस हम अपनी चेतना से जुड़ नहीं पाये और दुनिया से जुड़कर उनके शोषण का शिकार होते रहते हैं।
जबकि हमारे खुद के भीतर अनंत जीवन है अनन्त शक्ति है,अनंत प्रेम है । उस प्रेम को करुणा बनाओ… कमजोरी नहीं और फिर देखो जिंदगी का स्वरूप कुछ अलग ही होगा तुम खुद अपने आप को माफ करो और उसे प्रेम दो सबसे पहला कर्तव्य हमारा खुद से प्रेम करना है ।
सोनम यह सब बातें सुनकर हल्की होती चली गई।
अब वह काफी हद तक शांत थी। सजल नैनों से उसने मुझे एक आशा भरी नजरों से निहारा और मेरा यह सफर मुझे सुकून दे गया।

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

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