रावण की चेतना का स्तर : उसकी नाभि में उसकी 10 अधूरी इच्छाएं — संगीता जड़िया ‘सृजन सारथी”

हमने सुना है कि रावण की नाभि में अमृत था। पर किसी ने यह नहीं सोचा कि *उस नाभि में अमृत था ही नहीं, वहाँ उसकी अधूरी इच्छाएं जमा थीं।
रावण मरा नहीं था, वह अटका हुआ था। और मनुष्य कभी शरीर से नहीं मरता, वह अपनी अधूरी इच्छाओं में अटक कर मरता है।
उसके दस सिर कोई चमत्कार नहीं थे। वे चेतना के दस स्तर थे, दस दिशाओं में भागती हुई दस अधूरी प्यास।
पहला सिर कहता था … और ज्ञान चाहिए। वह चारों वेद जानता था, फिर भी तृप्त नहीं था। ज्ञान की भूख जब अहंकार बन जाए तो वह सिर बन जाती है।
दूसरा सिर – और सत्ता चाहिए। लंका सोने की थी, पर उसे स्वर्ग भी चाहिए था। सत्ता की भूख कभी पूरी नहीं होती।
तीसरा सिर – और मान्यता चाहिए। वह चाहता था कि शिव भी उसे प्रणाम करें। जिसे सबके प्रमाण पत्र चाहिए, वह भीतर से बहुत अप्रमाणित होता है।
चौथा सिर – भोग की इच्छा। सीता कोई स्त्री नहीं थी, वह उसकी उस वृत्ति का प्रतीक थी जो दूसरे की पवित्रता को भी अपनी बनाना चाहती है।
पांचवा सिर – अमरता की इच्छा। जो अमर होना चाहता है, वह जीवन को कभी जीता ही नहीं।
और दसवां सिर – सबसे सूक्ष्म। वह था – मैं सही हूँ। यही अहंकार का अंतिम सिर है।
अब समझिए नाभि का रहस्य।
योग में नाभि को मणिपूर चक्र कहते हैं, इच्छाओं का केंद्र। रावण की सारी इच्छाएं वहीं आकर इकट्ठी हो गई थीं। वह अमृत नहीं था, वह जमाव था। अधूरी इच्छाओं का जमाव।
दर्शन यही कहता है… मनुष्य को सिर काटने से नहीं मारा जा सकता। एक सिर काटो, दूसरा उग आएगा। मारना है तो केंद्र पर मारना होगा। नाभि पर।
राम की विजय शस्त्र की विजय नहीं थी। वह एक चेतना की, दूसरी चेतना पर विजय थी।एक ऐसी चेतना जो पूर्ण है, जो कहती है,… मेरे पास जो है, वही पर्याप्त है, उसकी विजय उस चेतना पर जो कहती है,.. मुझे और चाहिए।
इसलिए विजयदशमी पर रावण को बाहर मत जलाइए। एक क्षण अपनी नाभि पर हाथ रखिए और पूछिए … *मेरी कौन सी दस अधूरी इच्छाएं हैं जो मुझे अमर नहीं, अटका कर रखे हुए हैं?*
जिस दिन आपने अपनी नाभि में पड़े उस झूठे अमृत को सुखा दिया, उसी दिन आपका दशहरा हो जाएगा।




