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पुरुषोत्तम मास: काल के शून्य में आत्म-साक्षात्कार का महापर्व’ — डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ (अहमदाबाद, गुजरात)

 

​काल की अनंत यात्रा में जब सूर्य-चंद्रमा की गतियों के बीच सूक्ष्मतम गणितीय अंतराल आता है, तो सनातन मनीषा उसे ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में अंगीकार कर लेती है। जिसे सांसारिक व्यवस्था ने ‘मलमास’ कहकर उपेक्षित किया, उसे परमेश्वर ने अपना नाम देकर सर्वोत्तम बना दिया। दार्शनिक दृष्टि से, यह पंचांग का जोड़-घटाव मात्र नहीं, बल्कि मानव जीवन के उस हिस्से का प्रतीक है जिसे समाज अनुपयोगी मानकर छोड़ देता है।
​वैज्ञानिक रूप से यह चक्रों को संतुलित करने वाला ‘अधिमास’ है, परंतु आध्यात्मिक धरातल पर यह ‘शून्य से पूर्णता’ की यात्रा है। सांसारिक दौड़ और भौतिक सुखों के बीच यह मास एक ‘ब्रह्मांडीय ठहराव’ की तरह आता है। यह सिखाता है कि जो लोक-व्यवहार के लिए निरर्थक है, वही परमार्थ के लिए सर्वश्रेष्ठ है। जब बाह्य अनुष्ठानों पर विराम लगता है, तब स्वयं से साक्षात्कार की अंतर्यात्रा शुरू होती है। यह अवधि सांसारिक मुखौटों को उतारकर भीतर छिपी आत्मा को ‘उत्तम’ बनाने का समय है।
​यह अलौकिक दर्पण याद दिलाता है कि जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं है। यह मास भौतिकता के कोलाहल से हटकर, मौन के आगोश में अपनी चेतना को परमात्मा में विलीन करने का अनूठा दार्शनिक आमंत्रण है।

​-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ (अहमदाबाद, गुजरात)

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