100 दिवसीय वृक्षारोपण एवं हिंदी उत्सव से बनेगा सातवाँ विश्व रिकॉर्ड

12 देशों के 100 से अधिक प्रतिभागी होंगे शामिल, नन्हे रचनाकारों के दोहे, हाइकु और कविताएँ बढ़ाएँगी हिंदी उत्सव की गरिमा
भारत/इंडोनेशिया। पर्यावरण संरक्षण, हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और वैश्विक सांस्कृतिक एकता के उद्देश्य से आयोजित 100 दिवसीय वृक्षारोपण एवं हिंदी उत्सव सातवें विश्व रिकॉर्ड की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। 15 अगस्त 2026 से प्रारंभ हुए इस अभियान को 100 दिनों की अवधि में पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना पर आधारित यह आयोजन हिंदी और हरियाली के संदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने का प्रयास है।
इस अभियान की संस्थापक इंदु नांदल, जो छह बार विश्व रिकॉर्ड धारक रही हैं, के नेतृत्व में यह पहल पर्यावरण संरक्षण और हिंदी भाषा के संवर्धन को एक साझा मंच प्रदान कर रही है। आयोजकों के अनुसार, इसमें 12 देशों के 100 से अधिक प्रतिभागी तथा नौ विभिन्न मंच जुड़े हुए हैं।
आयोजन में मार्गदर्शक के रूप में एच. ई. रवि शंकर गोयल, कौंसल जनरल ऑफ इंडिया, मेदान, इंडोनेशिया, के साथ, विश्व हिन्दी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ विपिन कुमार , डॉ डीपी मिश्रा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विश्व हिंदी परिषद, भारत सरकार के हिंदी सलाहकार समिति शिक्षा मंत्रालय एवं सदस्य हिन्दी सलाहकार समिति ग्रामीण विकास मंत्रालय, राष्ट्रीय संपर्क समन्वयक डॉ नन्द किशोर साह, डॉ हरिओम शर्मा अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष जीवनधारा नमामी गंगे , भारत से ये चारों माननीय सदस्य विशिष्ट अतिथि के रूप में इस अभियान में जुड़े हुए है।
अमेरिका से डॉ. दुर्गा सिन्हा इस अभियान की मार्गदर्शिका है , और दुबई से डॉ. अमृत बिसारिया (काव्य संचालन) करेंगी। वहीं कनाडा से साहिल नांदल और भारत से डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ समन्वयक के रूप में इस अभियान से जुड़े हैं।
18 अक्टूबर को हुए विशेष काव्य पाठ में बच्चों ने दिया हिंदी प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का संदेश ।
इस 100 दिवसीय अभियान के अंतर्गत 18 अक्टूबर 2026 को प्रातः 9:30 बजे भारतीय समयानुसार विशेष काव्य पाठ आयोजित किया गया जिसमें कनाडा से शशी बाला ,साहिल व अमीषा,ऑस्ट्रेलिया से सुनिता शर्मा ,अमेरिका से मंजु महता इंडोनेशिया से गीता सेठ व रेखा ,भारत से, डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ पूनम लता, मोहिनी गुप्ता, मीरा कन्नौजिया ,प्राची अग्रवाल,रमा सरन ,सुनिती दूबे , सीमा पूरबा आदि उपस्थित रहे ।
इस कार्यक्रम में छोटे बच्चों ने भी दोहे, हाइकु और स्वरचित कविताओं के माध्यम से अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया। उनकी सहभागिता ने हिंदी उत्सव को नई ऊर्जा प्रदान की ।
इस आयोजन की विशेषता यह थी कि बच्चे ने केवल साहित्यिक प्रस्तुतियाँ ही नहीं दी ,बल्कि हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने कर्तव्य एवं दृढ़ निश्चय को भी अभिव्यक्त किया। उनकी रचनाओं में प्रकृति के प्रति संवेदना, पेड़-पौधों के संरक्षण की आवश्यकता और अपनी भाषा के प्रति सम्मान का भाव प्रमुखता से सामने आया।
आज के बच्चे ही कल के भविष्य के कर्णधार हैं। उनमें साहित्य के प्रति रुचि, हिंदी के प्रति आत्मीयता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना आने वाली पीढ़ियों को संवेदनशील बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास है। जब नन्हे रचनाकार दोहों में वृक्षों का महत्त्व बताते हैं, हाइकु में प्रकृति की सुंदरता समेटते हैं और कविताओं में पर्यावरण बचाने का आह्वान करते हैं, तब उनकी अभिव्यक्ति सामाजिक चेतना का माध्यम बन जाती है।
कलम और कुदाल के साथ आगे बढ़ रहे अभियान
का मूल उद्देश्य साहित्य और पर्यावरण को एक-दूसरे से जोड़ना है। वृक्षारोपण के माध्यम से धरती को हरा-भरा बनाने तथा काव्य पाठ एवं साहित्यिक गतिविधियों के जरिए हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। ‘कलम और कुदाल साथ चलाएँ, समाज व धरा महकाएँ’ का संदेश इस अभियान की मूल भावना को व्यक्त करता है।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा से प्रेरित यह पहल भाषा, प्रकृति और मानवता के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करती है। आयोजन में बच्चों की भागीदारी इस विश्वास को मजबूत करती है कि हिंदी की संवेदना और पर्यावरण संरक्षण की चेतना नई पीढ़ी के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ेगी।
जब नन्हे हाथ पौधों को सँभालने का संकल्प लेते हैं और नन्हे होंठ हिंदी की कविताएँ गुनगुनाते हैं, तब भविष्य केवल सुंदर होने का सपना नहीं देखता, बल्कि उसे सुंदर बनाने की शुरुआत भी करता है। यही इस 100 दिवसीय हिंदी उत्सव की सार्थकता और सातवें विश्व रिकॉर्ड की पहल का प्रेरक संदेश है।
विशिष्ट अतिथि विश्व हिन्दी परिषद के अध्यक्ष आ विपिन ने अंत में आयोजन को भव्य व सफल बताया जिससे सभी प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ गया ।
मीडिया प्रभारी: डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’




