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आधुनिक शिक्षित नारी फिर भी दहेज प्रथा का शोषण क्यों – अनिता शर्मा ‘निशा’ की कलम से

 

कितने ही कानून बन गए किन्तु दहेज प्रथा को मिटा सके ऐसा कोई कानून सक्षम नहीं हुआ। या यूँ कहिये कि नहीं होने दिया गया।
दहेज प्रथा को हम बचपन से सुनते और पढ़ते आ रहे हैं। किंतु कम होने के बजाय और भी विकराल रूप दिखता है। पहले कहा जाता था कि बिटिया को शिक्षित करो तो दहेज नहीं देना पड़ेगा किन्तु आज पढ़ी-लिखी स्त्री है तो भी दहेज के लिए मार काट मची हुई है।
दहेज कन्या को दिया जाने वाला उपहार है। जो पुराणों में भी वर्णित हैं। रानी शकुंतला को कन्व ऋषि के आश्रम से विदा होने पर पेड़ पौधों ने अपने पत्ते गिराकर उपहार दिए थे। यही उपहार शनैः शनैः दहेज का रूप लेते गए।
आज सबसे बड़ी कमी इंसान के भीतर सम्वेदना का अभाव हो गया है। दिखावे के कारण कोई किसी की परिस्थिति समझना नहीं चाहता। जितना हो सके दूसरे से फायदा उठाना ही प्रमुखता हो गई है। दूसरी बात है प्रतिस्पर्धा….।यदि उसके बेटे को दहेज ज्यादा मिला है तो मुझे क्यों नहीं?
इसलिए आधुनिक शिक्षित नारी भी दहेज जैसी कुरीति से दूर नहीं हो पा रही है।

अनिता शर्मा “निशा ”
देवास (मध्य प्रदेश)
स्वरचित।

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