अधिक (पुरुषोत्तम) मास का सच्चा आध्यात्मिक रहस्य – डाॅ.शुचिता नेगी “शुचि”

यह सृष्टि काल चक्र चार अवस्थाओं से गुजरता है _सतो प्रधान सतयुग, सतो सामान्य त्रेतायुग, रजो प्रधान द्वापर और अंत में तमो प्रधान कलयुग । यह पूर्णतः एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। जैसे रात दिन का चक्र निश्चित होता है इसी प्रक्रिया का एक और सूक्ष्म रूप हम आत्माओं का यह शरीर जो की पांच जड़ तत्वों से बना होता है ।शरीर को भी बचपन सतो ,युवा रजो और वृद्धावस्था तमो अवस्थाओं से गुजरना होता है,अंत में पुराने वृद्ध शरीर को त्याग कर आत्मा पुनः नया शरीर लेकर इस चक्र को दोहराती है। सृष्टि के सतो प्रधान और सतो सामान्य अवस्था में शरीर प्रकृति के ५ तत्व भी सात्विक अवस्था में मिलते हैं तो उन श्रेष्ठ युगों में शरीर, की आयु पूर्ण होने के बाद किसी प्रकार के दुःख की अनुभूति नहीं करते हैं । द्वापर से रजो प्रधान युग की शुरुआत होती है तो आत्मा का पांच तत्वों से बने शरीर, संबंधी और पदार्थ से लगाव होने लगता है और तमो प्रधान कलयुग आने तक तो यह लगाव इतना गहरा हो जाता है कि शरीर अत्यंत जीर्ण-शीर्ण ,कमजोर ,दुःखदायी बीमारियों से ग्रस्त होने पर भी आत्मा उसे छोड़ना नहीं चाहती है ।यह प्रकृति के पांच तत्वों के साथ-साथ आत्मा के भी पतन की पराकाष्ठा होती है। यह सृष्टि चक्र के परिवर्तन का समय कलयुग का अंत और सतयुग का आरंभ होता है, जब भगवान शिव सद्ज्ञान का अमृत कलश लेकर हम मनुष्य आत्माओं को अपने अमरत्व का सच्चा सच्चा बोध कराने इस सृष्टि पर अवतरित होते हैं और हमें ऐसा अमृत प्राप्त करने के पुरुषार्थ के लिए मार्गदर्शन करते हैं। इस घोर पीड़ा से जीते जी मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है सत्य ज्ञान का मनन चिंतन मंथन अभ्यास और पुरानी तमो प्रधान दुनिया से वैराग्य। शरीर से ममत्व वही मिटा सकने में सक्षम है जो स्वयं ऐसा अशरीरी विदेही बना हो, जिसके बारे में गायन है विश्वनाथ जो सृष्टि के आदि पुरुष है जिनको शंकर ,आदि देव ,आदम ,एडम ,मनुष्य सृष्टि के बीज ( रचयिता ) त्रिकालदर्शी ,महाकाल आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है।शंकर अपने मनन चिंतन मंथन अभ्यास ,उच्चतम वैराग्य वृत्ति और तपस्या के द्वारा ऐसी ऊंची स्थिति को प्राप्त करते हैं।यदि हम मनुष्य आत्माओं को भी इस दुःखदाई शरीर,दुनिया से मुक्ति का अनुभव प्राप्त करना है ,परम शांति और सच्चे सुख का अनुभव करना है तो भोलेनाथ की सतत स्मृति में रहना होगा, उनका ही अनुकरण करना होगा। आदि देव महादेव भगवान शिव के ज्योति स्वरूप की याद में सदा मगन रहते हैं क्योंकि एकमात्र शिव ही हैं जो सदैव जन्म मरण (साकार) शरीर के चक्र से मुक्त रहते हैं वो त्रिकाल दर्शी हैं।मनुष्य सृष्टि के रचयिता आदिनाथ शंकर भगवान शिव की ही स्मृति में रहकर शिव समान निराकारी और त्रिकालदर्शी बनते हैं, इसलिए 33 करोड़ देवी देवताओं में सिर्फ उनका ही नाम शिव के साथ जोड़ा जाता है तो कहते हैं परमपिता परमात्मा, शिव शंकर ,भोले भाले।शंकर की शिव समान अवस्था की यादगार स्वरूप को भक्तगण शिवलिंग के रूप में भी पूजते हैं। यह गुह्य आध्यात्मिक ज्ञान भगवान शिव इसी पावन संगम युग के समय देते हैं जबकि अति तामस, काली, भ्रष्ट दुःखदाई कलयुगी दुनिया का अंत और सतो प्रधान ,प्रकाश मयी सुखदाई सतयुग की दुनिया के आरंभ का होता है । दोनों युगों के बीच के इस छोटे से संगम की यादगार शास्त्रों में अधिक मास के रूप में वर्णित है । चूंकि यह भ्रष्ट पतित तमो प्रधान बन चुकी मनुष्य आत्मा को श्रेष्ठ ,पुरुषों में उत्तम सतो प्रधान, पवित्र बनाने का अति महत्वपूर्ण युग है, इसलिए इसका गायन पुरुषोत्तम मास के रूप में भी किया जाता है।
डाॅ.शुचिता नेगी “शुचि”




