सच्ची पूजा — माया शर्मा
अचानक से मेरा मन हुआ कि मंदिर में भगवान के दर्शन करने जाऊँ। फटाफट से पूजा की थाली सज़ा कर पास के मंदिर में दर्शन के लिए चल पड़ी I मंदिर के दरवाजे पर पहुँच कर बाहर चप्पल खोल ही रही थी कि एक कोमल स्पर्श ने मेरे पैरों को सहलाया । मेरा ध्यान अचानक नीचे अपने पैरों के पास बैठे बच्चे पर गया जो मेरी चप्पल खुलने का इन्तज़ार कर रहा था l जैसे ही मैंने चप्पल उतारी वो फटाक से उन चप्पलों को ले जाकर व्यवस्थित रख आया। जब पूजा करके मैं वापस आयी तो मेरी चप्पल लिए वो बच्चा तैयार खड़ा था l
मैंने उसके इस काम के लिए उसे ईनाम स्वरूप कुछ पैसे देने चाहे तो उसने मना कर दिया और कहने लगा दीदी ये तो हम मन्दिर में आए भक्तों की सेवा करते हैं। मैं समझ गयी कि वह बच्चा स्वाभिमानी है lअगले दिन मैंने उस बच्चे के लिए कुछ फल,मिठाइयाँ और कुछ कपड़े खरीदे और उसे ये कहते हुए थमाए कि मेरे बच्चे का जन्म दिन है और मैं ये सब उसके लिए उपहार स्वरुप लायी हूँ l बालक इस बार मुझे मना नहीं कर पाया, मगर उसकी आँखों में जो खुशी की चमक थी, उसने मेरे दिल को सुकून पहुँचाया था l
*माया शर्मा *




