वाणी के डिक्टेटर सच्चा संत कबीर– डॉ कौशल किशोर , साहित्यकार, लेखक कवि सह शिक्षक। पटना,बिहार

सच्चा संत की परिभाषा यह है कि वह पाखंड, अंधविश्वास और जातिगत भेदभाव से दूर रहकर प्रेम, समानता और ईश्वर की भक्ति मार्ग अपनाता है। संत कबीर ने हमेशा हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों में व्याप्त कुरितियों का कड़ा विरोध किया है। उनके लिए राम और रहीम एकही ईश्वर के दो नाम थे। उन्होंने समाज को भाईचारा और कर्म की महानता का संदेश दिया।
आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं में संत कबीर को केवल एक साधारण कवि या समाज सुधारक नहीं बल्कि स्वयं पूर्ण परमेश्वर माना गया है। मान्यता के अनुसार वे स्वर्ग लोक से इस नश्वर संसार में अवतरित हुए हैं। और वर्ग भेद को मिटाने के लिए अपनी वाणी का प्रयोग किया है। कबीर साहेब पंद्रहवीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। उनका जन्म १३९८ में काशी में माना जाता है। कहा जाता है कि एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उनका जन्म होता है। उनके उपर रामानंद का आशीर्वाद प्राप्त था। वे लोक लाज बस कबीर को लहरतारा के तालाब के पास फेंक आई थी। उन्हें निरू और नीमा नामक जुलाहे ने ले जाकर पालन पोषण किया और अपने पेशे कपड़े बुनने के काम में लगाया।
इतिहास के मध्यकाल में प्रसिद्ध महान संत कबीर साहेब वास्तव में पूर्ण परमात्मा हैं जिन्होंने तत्व ज्ञान का प्रचार किया। उनके हजारों दोहे में मुख्यतः सौ दोहे जीवन की धारा को बदलने के लिए काफी है। रामानंद जी भी उन्हें शिष्य बनाने के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि कबीर एक जुलाहे (मुस्लिम) थे। दीक्षा पाने के लिए संत कबीर एक दिन सुबह-सुबह उस घाट की सिढियों पर लेट गये जहां से गुरू रामानंद जी स्नान करने के लिए जाते थे। अंधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर को लग गया। और गुरु के मुख से राम -राम की ध्वनि निकल पड़ा कबीर दास जी ने इसी को दीक्षा मंत्र मान लिया ।
कबीर वैवाहिक बंधन में भी बंधे थे उनकी पत्नी का नाम लोई था। कबीर दास जी के दो संतान भी थे पुत्र कमाल और पुत्री कमाली। वे ईश्वर भक्ति के साथ साथ कपड़े बुनने का काम करते थे। वे मानते थे कि गार्हस्थ्य जीवन जी कर भी ईश्वर भक्ति में रमा जा सकता है। कबीर साहेब ने हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों की कटरता , मुर्तियां पूजन ,छुआछूत और दीखावे का विरोध किया। कबीर दास जी को मारने के लिए कयी षड्यंत्र रचे गए वे बार-बार बचते रहे। कबीर दास जी का निधन १५१८ई यू हुआ था। इनकी समाधि मगहर में है। वे अंतिम समय में काशी छोड़ दिये थे। उस समय यह अंधविश्वास था कि काशी में मरने वाले को मुक्ति और मगहर में मरने वाले को नरक मिलता है। इसी अंधविश्वास को तोड़ने के लिए वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में मगहर चले गए थे। १२० वर्षों तक वो पृथ्वी पर जिवीत रहे ।मरने पर हिंदू मुस्लिम में विवाद हो गया दाह-संस्कार को लेकर लेकिन कहा जाता है की इनके मृत शरीर पर से चादर हटाया गया तो दो फूल मिला दोनों समुदाय के अपने अपने धर्म के अनुसार फूल बांट कर संस्कार किया।
कबीर दास जी की काव्यगत विशेषताएं, निर्गुण ब्रह्म की उपासना, अवतार वाद का विरोध, गुरु का महत्व, बाह्यांडवरो का विरोध, जाति-पाति का विरोध।
उनके अनुसार ईश्वर अगम अगोचर हैं। अजन्मा है और निर्विकार है। “निर्गुण रामि, निर्गुण राम जपो रे माई।
अवगत की गति लखी न जाई।
संत कबीर अपने ईश्वर को राम कह कर पुकारते थे। लेकिन वह राम दशरथनन्दन राम नहीं, बल्कि घट घट बासी ईश्वर को कहते हैं।
“दुल्हिन गावहु मंगलाचार ,
हमारे घर आए हो
राजा राम भरतार। कबीर की वाणी आज भी प्रासंगिक हैं। जन जन की गीता है ।आज कबीर मरकर भी अमर हैं। उन्होंने दोनों समुदायों को चेताया और अपनी वाणी से लोगों में एक नव चेतना का संचार भरा।
डॉ कौशल किशोर
साहित्यकार, लेखक कवि सह शिक्षक। पटना,बिहार




