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गौसेवा ही राष्ट्रसेवा का आधार, सनातन संपूर्ण सृष्टि का शाश्वत सत्य – संत श्री बाल शरण व्यास जी

 

जयपुर। गौशाला सुरपुरा। भारत की संस्कृति केवल परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक ऐसी शाश्वत पद्धति है जो समस्त सृष्टि के कल्याण का संदेश देती है। इसी सनातन संस्कृति का मूल आधार है गौसेवा, प्रकृति संरक्षण और मानवता का उत्थान। व्यास जी का यह संदेश कि गौसेवा ही राष्ट्रसेवा का आधार है और सनातन संपूर्ण सृष्टि का शाश्वत सत्य है आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायी है।सनातन धर्म में गौमाता को केवल एक पशु नहीं, बल्कि समस्त देवताओं का निवास और मातृत्व का प्रतीक माना गया है। गाय का दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र भारतीय जीवन पद्धति, कृषि, आयुर्वेद और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। गौसेवा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज, समृद्ध कृषि और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला भी है।संत श्री बाल शरण व्यास जी का कहना है कि सनातन किसी एक जाति, वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। सूर्य की किरणों से लेकर चंद्रमा की शीतलता तक, पृथ्वी की धैर्यशीलता से लेकर आकाश की अनंतता तक समस्त सृष्टि सनातन के सिद्धांतों पर ही आधारित है। सनातन हमें प्रेम, सेवा, करुणा, सहिष्णुता और प्रकृति के प्रति सम्मान का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित न रहें, बल्कि अपने जीवन में गौसंरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छता, जल संरक्षण और मानव सेवा जैसे कार्यों को भी अपनाएँ। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्रसेवा है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति गौमाता की रक्षा, पर्यावरण की सुरक्षा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का संकल्प लेगा, तभी एक सशक्त, समृद्ध और संस्कारित भारत का निर्माण संभव होगा।संत श्री बाल शरण व्यास जी ने आह्वान किया कि प्रत्येक परिवार समय-समय पर गौशालाओं में सेवा करे, अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और सनातन के मूल्यों से परिचित कराए तथा समाज में प्रेम, सद्भाव और सेवा की भावना को बढ़ावा दे। यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी विरासत होगी। व्यास जी अपील करते हुए कहा कि हम सब संकल्प लें कि गौसेवा को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे, सनातन संस्कृति के आदर्शों का पालन करेंगे और राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँगे। क्योंकि जब संस्कृति सुरक्षित होगी, तभी समाज सुरक्षित होगा; जब गौमाता सुरक्षित होगी, तभी प्रकृति सुरक्षित होगी; और जब प्रकृति सुरक्षित होगी, तभी मानवता का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

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