Uncategorized

कवि कृषक : शब्दों की धरती का अन्नदाता- कविता साव पश्चिम बंगाल

 

भारतीय संस्कृति में कृषक को अन्नदाता कहा गया है, क्योंकि वह धरती पर बीज बोकर मानव जीवन के लिए अन्न उत्पन्न करता है। उसी प्रकार कवि भी समाज का एक कृषक है। अंतर केवल इतना है कि किसान मिट्टी में बीज बोता है, जबकि कवि मनुष्य के हृदय में शब्दों के बीज बोता है। किसान शरीर का पोषण करता है, तो कवि आत्मा का। एक अन्न उगाता है, दूसरा विचार, संवेदना और संस्कार।

कवि की कलम उसका हल है। कल्पना उसकी भूमि है। अनुभव, अध्ययन और जीवन-संघर्ष उसका बीज हैं। करुणा, प्रेम, सत्य और सौंदर्य उसके जल, खाद और धूप हैं। जब वह अपने अनुभवों को शब्द देता है, तब वे शब्द धीरे-धीरे अंकुरित होकर कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी या महाकाव्य का रूप लेते हैं। यह सृजन केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि समाज को दिशा भी देता है।

जैसे किसान फसल बोने के बाद धैर्यपूर्वक ऋतुओं की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही कवि भी अपने सृजन को समय की कसौटी पर परखता है। वह आलोचना की आँधियाँ, उपेक्षा की धूप और संघर्ष की वर्षा सहता है, फिर भी शब्दों की खेती नहीं छोड़ता। उसकी फसल तात्कालिक नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक फल देने वाली होती है।

इतिहास साक्षी है कि अनेक कवियों ने अपने शब्दों से समाज में नई चेतना जगाई। कबीर ने अंधविश्वास पर प्रहार किया, तुलसीदास ने लोकमंगल का मार्ग दिखाया, मैथिलीशरण गुप्त ने राष्ट्रीय भावना को स्वर दिया, माखनलाल चतुर्वेदी और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने स्वाधीनता और स्वाभिमान की मशाल जलाई। उनके शब्द आज भी मानवता की फसल को सींच रहे हैं।

आज के समय में, जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक प्रदूषण, संवेदनहीनता और विभाजन से जूझ रहा है, तब कवि कृषक की भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उसे ऐसे शब्द बोने होंगे जो प्रेम, सह-अस्तित्व, पर्यावरण संरक्षण, मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय एकता के पौधों को विकसित करें। यदि शब्दों के खेत में घृणा बोई जाएगी, तो समाज में वैमनस्य उगेगा; यदि प्रेम और सत्य के बीज बोए जाएँगे, तो विश्वास और सद्भाव की हरियाली फैलेगी।

इसलिए प्रत्येक कवि का दायित्व है कि वह अपनी लेखनी को केवल प्रसिद्धि का साधन न बनाए, बल्कि लोककल्याण का माध्यम बनाए। उसकी रचनाएँ मनुष्य के भीतर सोई हुई करुणा को जगाएँ, निराश मन में आशा का संचार करें और समाज को बेहतर भविष्य की ओर ले जाएँ।

निष्कर्षतः, कवि वास्तव में शब्दों की धरती का कृषक है। उसकी फसल दिखाई नहीं देती, पर उसका प्रभाव युगों तक बना रहता है। किसान की हरियाली जीवन को जीवित रखती है और कवि की हरियाली जीवन को सार्थक बनाती है। यही कारण है कि शब्दों का यह कृषक मानव सभ्यता का मौन, किन्तु सबसे प्रभावशाली अन्नदाता है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!