जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहाँ शिव आरंभ होते हैं। – डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

सावन केवल एक मास नहीं, बल्कि प्रकृति और चेतना का महा संवेदनापूर्ण मिलन है। आकाश के आँसू जब धरा को भिगोते हैं, तब अंतःस्थल से उठने वाला आदि स्पंदन ही शिव है। शिव कंठ में हलाहल विष रोककर नीलकंठ बनते हैं।यह संदेश देता है कि संसार के संतापों को समाज में छितराने के बजाय अपने भीतर आत्मसात करना ही सच्ची साधना है।
कैलाश की शून्यता और नंदी का मौन हमारे अहंकार के विसर्जन का प्रतीक है। गले में सर्प और अंगों पर भस्म इस नश्वर शरीर का सत्य उजागर करती है कि जो मृत्यु को आभूषण बना ले, उसे कोई भय नहीं रहता। अर्धनारीश्वर रूप हमें यह सिखाता है कि चेतना और शक्ति के सामंजस्य बिना संसार का संतुलन असंभव है। सच्ची शिव आराधना केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने भीतर की ईर्ष्या और संकीर्णता को जलाकर हृदय को करुणा का सागर बनाना है। जब हम किसी के संताप को सहते हैं, तभी भीतर साक्षात् शिव का अवतरण होता है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




