नाग पंचमी विषय विकारी संस्कारों के परिवर्तन का पर्व — डाॅ.शुचिता नेगी “शुचि” की कलम से

भगवान शिव शंकर भोलेनाथ के साथ नाग देवता की भी पूजा का यह विशेष पर्व पवित्र श्रावण मास में ही मनाया जाता है । वैसे तो नाग में विष होता है परंतु विषधर शिव भोले बाबा के संग के रंग में आने से उसका विषैलापन खत्म हो जाता है और वह पूजनीय बन जाता है। वास्तव में कलयुग के अंत में सभी मनुष्य आत्माएं स्वभाव संस्कार से विषैली बन जाती हैं अर्थात पतित तमो प्रधान बन जाती हैं ।काम ,क्रोध ,लोभ, मोह, अहंकार रूपी पाॅंच विकार आत्मा को विषैला बना देते हैं । शास्त्रों में भी आत्मा का वर्णन आता है कि आत्मा निराकारी ,अमर ,अविनाशी है और जिस देह को धारण करके आत्मा साकारी बनती है वह देह तो पाॅंच तत्वों का बना मिट्टी का पुतला है, विनाशी है। आत्मा ही एक शरीर को त्याग दूसरा धारण करके 84 जन्मों का चक्र पूरा करती है। इस जन्म मरण के चक्र में आने से आत्मा अपने सत्य स्वरूप को भूल जाती है और कलयुग अंत तक चक्र पूरा होते आत्मा पतित तमो प्रधान बन जाती है क्योंकि वह स्वयं को विनाशी देह मान लेती है । आत्मा देह के संबंधों और पदार्थों से भी मैं मेरा पन जोड़ बैठती है, यह झूठा मोह आत्मा को विकारी बना देता है ,इसी झूठे मोह की स्मृति के कारण हमारा व्यवहार सांप के समान फुंफकारने जैसा विषैला हो जाता है। कभी काम विकार की फूंफकार ,कभी क्रोध की तो कभी राग द्वेष की फूंफकार मारते रहते हैं ।अब परमपिता परमात्मा शिव भोले बाबा हमें सतस्वरूप की स्मृति दिलाते हैं कि तुम इस विनाशी देह से अलग देह के मस्तक में विराजमान ज्योति बिंदु स्वरूप चैतन्य आत्मा हो, जैसे नाग के मस्तक में पारसमणी चमकता दिखाते हैं ठीक उसी तरह तुम भी चमकते चैतन्य सितारा हो। शंकर जी के मस्तक पर, गले में ,कमर में और दोनों भुजाओं में सांप लिपटे होते हैं जो शंकर जी को स्पर्श करने से अपना विषैलापन त्याग देते हैं और पूजन योग्य बन जाते हैं। मस्तक पर विराजित सर्प अहंकार का, गले में लिपटा सर्प मोह का, कमर में लिपटा कामवासना का और दोनों भुजाओं में लिपटे सर्प लोभ और क्रोध के प्रतीक हैं ।यह विषय विकार अपना विषैलापन छोड़ पवित्र सत् रूप में बदल जाते हैं जैसे लोहा पारस पत्थर का स्पर्श पाकर सोना बन जाता है। निराकारी परमपिता भगवान शिव और साकारी परमात्मा शंकर का मेल ही वह स्वरूप है जिनके स्नेहपूर्वक स्मृति मात्र से आत्मा के सारे विकार भस्म हो जाते हैं। यही इस पावन नाग पंचमी का रहस्य है की पांचविकारों से ग्रसित आत्मा जब साकार में आए निराकार भगवान को अच्छी रीति पहचान कर ,उन्हें सच्चे मन से याद करती है तो विष समान विकारों से सहज ही मुक्त होकर निर्विकारी पूजनीय बन जाती है।
— डाॅ.शुचिता नेगी “शुचि”




