स्मृतियों की पगडंडी- प्रवीणा सिंह राणा

जीवन की लंबी यात्रा में कुछ पगडंडियाँ ऐसी होती हैं, जिन पर समय की धूल तो जम जाती है, पर स्मृतियों के पदचिह्न कभी मिटते नहीं। जब भी मन वर्तमान की भीड़ से थक जाता है, वह अनायास उन्हीं पगडंडियों की ओर लौट पड़ता है, जहाँ बचपन अब भी मुस्कुराता हुआ प्रतीक्षा करता है।
मुझे आज भी अपना गाँव उतना ही अपना लगता है, जितना बरसों पहले था। कच्ची गलियाँ, मिट्टी की सौंधी महक, खेतों की हरियाली, सुबह-सुबह पक्षियों का मधुर कलरव और शाम ढलते ही घर लौटते पशुओं की घंटियों की टन टन,सब कुछ मानो स्मृतियों की गठरी में आज भी सुरक्षित रखा है।
बरसात का मौसम आते ही हम बच्चे कागज़ की नावें बनाकर बहते पानी में छोड़ देते थे। कभी नाव आगे निकल जाती तो लगता जैसे हमारी छोटी-सी दुनिया ने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो। पेड़ों पर झूले पड़ते, सावन के गीत गूँजते और हँसी की वह खनक पूरे गाँव को जीवंत बना देती।
दादी की कहानियाँ मेरी स्मृतियों का सबसे अनमोल हिस्सा हैं। रात को आँगन में बिछी चारपाइयों पर तारों भरे आकाश के नीचे बैठकर उनकी लोककथाएँ सुनना किसी जादुई संसार में प्रवेश करने जैसा लगता था। उन कहानियों ने केवल मनोरंजन ही नहीं किया, बल्कि जीवन के संस्कार भी दिए।
समय की धारा सब कुछ बदल देती है। अब गाँव की कई गलियाँ पक्की हो चुकी हैं, बहुत से चेहरे समय के साथ ओझल हो गए हैं, और बचपन के साथी अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। फिर भी जब कभी वहाँ जाना होता है, तो लगता है कि स्मृतियों की वही पगडंडी अब भी मेरा हाथ थामे चल रही है।
आज समझ में आता है कि स्मृतियाँ केवल अतीत का संग्रह नहीं होतीं, वे वर्तमान को संबल और भविष्य को दिशा देती हैं। जीवन चाहे जितनी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़े, मन की हमेशा वहीं लौटना चाहता है, जहाँ अपनापन बिना किसी शर्त के मिलता था।
सच ही है, स्मृतियों की पगडंडी कभी समाप्त नहीं होती; वह हर मोड़ पर हमें हमारी जड़ों से जोड़ती चलती है।
प्रवीणा सिंह राणा




